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Hindi Sex Story

पहाड़ी पर खूबसूरत गर्लफ्रेंड का कौमार्य भंग

मैं Sunita Prusty अपने सभी पाठकों को धन्यवाद करता हूँ और जिन्होंने मुझे संदेश भेज कर बधाई दी उनका आभार व्यक्त करता हूँ।
यह कहानी भी उसी दौर की है, 2nd सेमेस्टर परीक्षा के बाद मैं घर आ गया छुट्टियाँ बिताने।
घर की छत पर हम 5-6 लड़के, मैं, छोटे बड़े भाई और आस पास के 1-2 लड़के, प्लास्टिक या टेनिस गेंद से क्रिकेट खेला करते थे। वही गली क्रिकेट नियम जैसा।

पड़ोस के घर में एक युवा लड़की पास के शहर राजनांदगाँव से आई थी, वो रोज अपने घर की छत पर आती थी।
शुरआत में मैंने इतना ध्यान नहीं दिया क्यूंकि उस घर में हमारा आना जाना या बातचीत बहुत ही कम था, फिर सोचा ‘कोशिश करते हैं’ इसलिए मैं खेलते खेलते कभी आँख मारता, कभी ‘Hi’ का इशारा करता, कभी गेंद फेंकता उसके घर स्टम्प को मारने के बहाने।
उसने कम ही प्रतिक्रिया की।

ऐसे ही देखा देखी करते 2 दिन निकल गए।

एक दिन शाम 5 बजे, दूसरों के आने से पहले मैं और छोटा भाई (कजिन) क्रिकेट खेल रहे थे, मैं बॉलिंग कर रहा था, जब-जब देखूँ तो लगे कि वो हमारी तरफ ही देख रही है।
निर्धारित करने के लिए मैंने भी उसे देखना शुरू कर दिया और मुस्कुरा कर उसको इशारे करता, वो मुस्कुरा देती।
अब पक्का हो गया था कि वो भी लाइन दे रही है।

रजनी करीब 5 फ़ीट हाइट की छरहरी गोरी लड़की थी, चेहरा मासूम और खूबसूरत था, उसके शरीर का अंदाज़ा लगाना मुश्किल था क्यूंकि वह हमेशा ढीले ढाले सलवार कमीज़ पहने रहती थी।

कुछ देर बाद पता चला कि बाकी लोग नहीं आएंगे खेलने!
मैंने सोचा यही मौका है बातचीत बढ़ाने का… छोटे भाई को खेलने से मना कर दिया, उसके जाते ही मैंने रजनी से बात की।

‘नाम क्या है तुम्हारा, बाहर से आई हो?’ मैंने पूछा।
उसका जवाब आया- रजनी, नांदगांव से यहाँ छुटटी बिताने आई हूँ, यह मेरे मामा का घर है।
मैंने उसे छेड़ा- तुम्हें देख कर लगता है, छुट्टियाँ अच्छी बीतेगी, क्या बोलती हो?
उसने हाँ में सर हिलाया।
मैं समझ गया कि बात बन गई।

अगले दिन मैं सुबह दस बजे ऊपर छत पर गया, धूप खूब थी, कुछ मिनटों बाद कपड़े सुखाने रजनी छत पर आई।
मैंने पूछा- तुम यहाँ कब तक हो?
उसने जवाब दिया- बस 1-2 दिन और!
मैं सोचने लगा कि इतने कम समय में रजनी को सेक्स के लिए मनाऊँ कैसे।

‘क्या हम अकेले मिल सकते हैं?’ मैंने पूछा।
रजनी ने कहा- यहाँ नहीं, तुम अपना नंबर दे दो। मैं वापस घर जाकर फ़ोन करुँगी।
मैंने उसे अपना नंबर दे दिया।

दो दिन बाद वो चले गई।
फ़ोन पर हमने कुछ दिन सामान्य बातचीत की।

एक दिन उसका फ़ोन आया कि हम मिल सकते है पर बाहर, पूरा दिन खाली है।
मैं भी बाइक लेकर नाँदगाँव पहुँच गया, कॉलेज बैग में एक मोटी चादर, छोटी नैपकिन, पानी रख लिया था।
उसे जल्द पहन सके ऐसा एक जोड़ी कपड़े रखने को कहा।

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वो पूर्व निर्धारित समय पर हाइवे पर मिली, उसे लगा हम आस पास ही कहीं बैठेंगे बातचीत के लिए।
पर मैंने उससे कहा कि हम डोंगरगाँव जाएँगे, खुले में पहाड़ो के बीच बैठेंगे।
डोंगरगाँव वहाँ से 30-35 किलोमीटर दूर पहाड़ी इलाका है।

रजनी थोड़ा आनाकानी करने लगी।
मैंने कहा- ऐसा मौका वो भी पूरे दिन का, हर बार नहीं मिलता, बस दोनों तरफ पैर कर के मुझसे चिपक कर बैठो।
उसने वैसा ही किया, सुबह के साढ़े दस बज रहे थे, मैं बाइक कम स्पीड पर मजे लेते हुए चला रहा था, उसके बोब्बे मस्त मेरी पीठ से टकरा रहे थे।

पहले हमने एक मंदिर के पास बाइक स्टैंड पर लगाई, फिर लोगों से नज़र बचा कर एक पहाड़ी जगह की ओर आगे पीछे पैदल चल दिए, ताकि किसी को शक न हो।
मैंने एक थोड़ा झाड़ झंखाड़ और बड़े बड़े पत्थर के टीले के पीछे की जगह चुनी।
गर्मी बढ़ रही थी, लोगों का आवागमन भी कम हो चला था, वह स्थान थोड़ा ऊँचे पर था, मैंने चारों तरफ देखा कि कोई हमें देख तो नहीं रहा।

हम जल्द ही पहाड़ पर चढ़ कर कुछ पत्थरों के पीछे चले गए। यह स्थान तीन तरफ से बहुत बड़े बड़े पत्थरों और हम जिधर से अंदर आये और पीछे से हरी भरी बड़ी बड़ी झाड़ियों से घिरा था।
जो जगह चुनी थी वहाँ छाँव बहुत थी और आराम से हम लोग बैठ लेट सकते थे।

उस जगह पर पहुँच कर मैंने अपने कॉलेज बैग से चादर निकाल कर बिछा दिया। रजनी बहुत डर भी रही थी कि कोई आ जायेगा तो बदनामी होगी।
किसी ने हमें देखा नहीं या पीछा तो नहीं किया यह पुख्ता करने के लिए थोड़ा बाहर निकल कर चारों तरफ अच्छे से देख कर संतुष्टि कर आया।

रजनी बैठी थी और मैं उसके बगल में लेट गया। अब 4-5 घंटे थे हमारे पास मौज मस्ती करने के लिए।
मैंने रजनी के हाथों को सहलाना शुरु किया और कहा- तुमने कभी किसी के साथ सेक्स किया है?
उसने ना में सिर हिला दिया, वो शर्मा रही थी।

मैं उसके और करीब आ गया और हथेली को पकड़ कर चूमने लगा। रजनी ने आँखें बंद कर ली और मेरे बगल में लेट कर मुझसे चिपक गई, बोली- मुझे कुछ नहीं आता, सहेलियों से सुना बस है, मेरा यह पहली बार है।

मैंने कहा- बीच में रोकना टोकना मत, तुम बस मेरा साथ दो!
गर्मी थोड़ी थी पर ऊंचाई और छायादार होने की वजह से ज्यादा एहसास नहीं हो रहा था।

मैं उसे अपनी आगोश में लेकर चूमने लगा, अपने उलटे हाथ से से उसकी पीठ कमर को सहलाने लगा, वो मेरा साथ दे रही थी, मैं उसके होंठों को चूसने लगा।
वो गर्म होने लगी थी, उसकी आँखें बंद थी, हल्की हल्की आवाज़ें निकाल रही थी ‘म्मम्म म्म्म्म्म म्म्म म्म्म्म्म…’

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अब मैं उसके नितंबों को सहलाने लगा था, रजनी ने मुझे अपनी बाहों में जकड़ रखा था, वो बहुत बेसब्र हो चुकी थी, मैंने उसके और अपने कपड़े निकालने शुरू किये।
रजनी बहुत शर्मा रही थी।

‘उफ्फ क्या त्वचा थी उसकी मलाई जैसी!’
मैंने रजनी को ध्यान से देखा, बहुत ही खूबसूरत जिस्म की मल्लिका थी वो। उसका मस्त फिगर 32-24-34 का था।
रजनी की ब्रा को ऊपर सरका दिया, उसकी चूचियाँ बड़ी थी और तन चुकी थी जोश में।

मैं बिना देरी किये उसके गर्दन, कंधे पर चूमने लगा, धीरे धीरे मम्मों को दोनों हाथों से मसलते और दबाते हुए अब चूची को चूसना शुरु कर दिया।
रजनी सिहर उठी और मज़े से सिसकारियाँ भरने लगी- आआह्ह्ह ह्ह्ह्ह ह्ह्हम्म्म आअह्ह्ह्ह!
वो मेरी पीठ को सहलाने लगी, वह बहुत ही उत्तेजित हो चुकी थी, अपने दाँतों से होठों को चबा रही थी, अपनी कमर को हिलाने लगी थी।
मैंने रजनी पेट और नाभि के आस पास चूमते हुए उसके मस्त मम्मो को मसलना ज़ारी रखा।
रजनी को बहुत मज़ा आने लगा था, वो अब मादक आवाज़ें निकलने लगी थी- कुछ कुछ हो रहा है जान, आआह्ह्ह आह्ह्ह, कुछ करो जान आह्ह्ह अह्ह्ह!

मैंने उसकी पैंटी को निकल दिया, उसने अपने दोनों पैर शर्म से सटा लिए थे, फिर मैं उसके पाँव को सहलाते हुए चूमने लगा।
उसने आँखों को अपनी बाहों से ढक लिया और सिसकारियाँ भरने लगी- म्म्म्म म्म्म्म आअह्ह अह्ह्ह…
धीरे धीरे ऊपर चूमते हुए बढ़ने लगा, जांघों को चूमने और चाटने लगा, रजनी के पैरों की अकड़ ढीली होने लगी।

मैंने उसके पैर फ़ैला दिए और सीधा उसकी चूत चाटने लगा। उसकी चूत बहुत गीली थी, उसका पानी पहले से बाहर आ निकला था। मैंने सीधे हाथ की बीच की ऊँगली को उसकी चूत में डालना शुरू किया, रजनी सिहर उठी, उसे दर्द होने लगा था।
मैंने उसकी हालत समझते हुए कहा- रजनी, तुम बस साथ दो और मज़ा लो, तुम्हें कुछ नहीं होगा।

उसने कहा- और यह दर्द?
मैंने उसकी चूत को चूमते हुए जवाब दिया- शुरू में थोड़ा होगा, फिर कभी नहीं।

थोड़ी देर उसकी चूत को चाटने और उंगलियों से सहलाने के बाद मैंने रजनी से मेरे लंड को चूसने के लिए कहा।
वह मेरे लंड को हाथ में लेकर लॉलीपॉप जैसे चूसने लगी, अपने जीभ से लंड के सुपारे को चाटने लगी।
मैं मस्त हो चला था और मेरा लंड भी, अब मुझसे भी बर्दाश्त नहीं हो रहा था, रजनी का कौमार्य भंग करने के लिए मेरा लंड भी फड़फड़ा रहा था।
कोमल मासूम चेहरा, ऊपर से खूबसूरत छरहरी काया को और इंतज़ार नहीं कराना चाहता था।

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रजनी को लेटा कर मैं उसके ऊपर चढ़ गया, उसके होठों को जोरदार चूमने चूसने लगा।
मेरा लंड रजनी के चूत के दाने रगड़ खा रहा था।
रजनी बहुत गरम हो चुकी थी पहले से ही अपने कूल्हे खूब हिला रही थी।

मैं उठा और लंड पर अच्छे से थूक लगा कर चूत पर सटा दिया।
रजनी उत्तेजित भी थी और डरी भी… डर के मारे उसने अपने बदन को कस लिया था।
मैंने उसे सहज रहने को कहा वरना दर्द ज्यादा होगा।

रजनी ने आँखें बंद कर ली, मैं अब धक्का लगाने लगा।
‘आह्ह माँ..’ रजनी दर्द के मारे चिल्ला उठी, उसकी आँखों से आँसू बहने लगे पर उसने मुझे जरा भी नहीं रोका, वो चुदना चाहती थी। इस समय को, इस पल को, लंड के सुख को भोगना चाहती थी।

मैं धीरे धीरे धक्का देने लगा, थोड़ी मेहनत लग रही थी, मेरा मोटा लंड बड़ी मुश्किल से अंदर जा रहा था, दर्द उसके चेहरे पर साफ झलक रहा था।
मैं अब जोर से रजनी को चोदने लगा।

रजनी भी अब रंग में आ गई थी और मादक आवाज़ें निकल रही थी- आआअह्ह्ह अह्ह्ह्ह…
उसकी साँसें बहुत तेज हो गई थी।
वो झड़ते हुए जोर से चिल्लाई- आआह्हह्हह्ह अह्ह्ह्ह अह्ह्ह्ह
और बोली- जान, तुमने आज मुझे पूरा कर दिया।
और मुझे बेतहाशा चूमने लगी।
रजनी बहुत कांप रही थी।
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मैंने अपना लंड चूत से निकाल कर तेजी से मुठ मार कर पूरा वीर्य उसके पेट नाभि पर गिरा दिया।
एक दूसरे के बाजू में हम लेट गए और खूब चूमने लगे।
रजनी अभी भी बहुत कांप रही थी।
हालत समझते हुए मैंने उसको वापस घर के लिए चलने को कहा।
रजनी ने नैपकिन से वीर्य पोंछा और बैठे बैठे ही कपड़े पहने और बोली- मैंने सहेलियों से जाना था यह सब, और हमेशा सोचती थी उनके जैसे मेरा भी कोई बॉयफ्रेंड हो जिसके साथ मैं सेक्स कर सकूँ और वास्तव में सेक्स मज़ा ले सकूँ!

हमने फिर एक दूसरे को चूमा, सामान इकट्ठा कर नीचे की ओर आने लगे।
दर्द के कारण रजनी को चलने में तकलीफ हो रही थी।
मैं जल्दी से उसे बाइक पर बैठा कर ले आया और उसके घर के पास तक छोड़ कर वापिस आ गया।

हमने फिर सेक्स किया वो भी थिएटर जैसे आम जगह पर… वो कहानी फिर कभी॥! — bhauja.com

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