रेखा भाभी की मायके में चुदाई

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रोनी सलूजा
मैं ऑफिस में बिल्कुल निठल्ला बैठा था, सामने मेरी असिस्टेंड लीना अपने रिकार्ड दुरुस्त कर रही थी, मैं उसके यौवन के अग्र उभारों का नजारा कर रहा था मेरा जानवर अंगड़ाई लेकर जागने लगा था !
अब तो लीना मेरे से बिल्कुल खुल गई थी यानि मैं भी उसका सब कुछ खोल चुका था, सोच रहा था कि कोई काम अभी है नहीं, बहुत दिनों से इसका मजा भी नहीं लिया, मैंने ऑफिस का बाहरी शीशे वाला दरवाजा अन्दर से बंद कर लिया फिर उसे ऑफिस के अन्दर के दूसरे कमरे में ले जाकर उसकी जवानी का रस पीने के लिए उसे बुलाता, तभी साले का फोन आया !

‘जीजाजी नमस्ते, कैसे हो?’
मैं- ठीक हूँ, कैसे याद किया, रेखा भाभी कैसी हैं?
साला- जीजाजी, सब ठीक है, आपको एक कष्ट दे रहा हूँ, एक हफ्ते पहले मेरे साले विनोद की शादी में चलना था तो आप तो व्यस्तता के कारण हमारे साथ गए नहीं, फिर मैं रेखा और बेटे को लेकर चला गया था ! फिर बेटे की परीक्षा के कारण मैं आ गया था लेकिन रेखा को ससुराल वालों एवं आये हुए रिश्तेदारों के आग्रह पर वहीं छोड़ना पड़ा, अब मैं उसे लेने नहीं जा पा रहा हूँ ! अगर आप फ्री हों तो रेखा को लेने आप चले जाओ, तो मेरे साले विनोद और उसकी पत्नी को शादी की बधाई भी दे आना, वे आपको सभी बहुत याद कर रहे थे !
मैंने कहा- ठीक है, कल या परसों जैसे ही समय मिलेगा, मैं जाकर ले आऊँगा रेखा भाभी को !
अब मेरे दिल में रेखा से मिलने की इच्छा बलवती होने लगी। लीना की चुदाई का ख्याल छोड़ दिया यह सोचकर कि घर की मुर्गी दाल बराबर, कौन सा भागी जा रही है।
लीना के बारे में अगली कहानी में जरुर लिखूँगा ! रेखा मेरी सलहज के बारे में वो सभी पाठक जानते होंगे जिन्होंने मेरी पूर्व प्रकाशित कहानी ‘नया मेहमान’ पढ़ी होगी, कहानी में कैसे मैंने उसे पटाया था, कैसे उसकी चुदाई की थी, फिर अचानक उसे जाना पड़ा और मेरी सारी रात चुदाई की तमन्ना अधूरी रह गई थी- नया मेहमान’ अगर नहीं पढ़ी तो जरुर पढ़ लें !
मुझे विश्वास तो नहीं पर उम्मीद जरूर थी कि शायद कोई मौका मिल जाये रेखा को चोदने का ! क्योंकि शादी वाला घर मेहमानों का
डेरा होता है फिर उसकी चुदाई के लिए अचूक सी योजना बनाने लगा !
बार बार सलहज के बारे में सोच कर उत्तेजित हो रहा था, उसकी चुदाई के बाद तो मुझे देख वो कुछ ज्यादा ही लजाने सी लगी थी उसकी चंचल हिरणी सी आँखें जैसे हरदम कुछ कहना चाहती थी, लेकिन अब कोई मौका नहीं मिल रहा था, मैं कोई रिस्क लेना नहीं चाहता था ! क्या मस्त माल है, कितनी गजब कशिश है उसमें, खास बात जो थी वो उसकी अदाएँ, जो मुझे उसका दीवाना बनाये हुए थी, उसका गेहुंआ रंग निखर कर खिल सा गया है, उसका जिस्म जैसे सांचे में ढला हो, चेहरा गोल, उस पर बड़ी बड़ी कजरारी आँखें, बेदाग गाल, जब हँसती तो गाल में गड्डे पढ़ जाते, संतरे की कलि से होंट रस से भरे, नाक में गोल नथ बड़ी सी, ऊपरी होंट पर काला तिल ! उस पर काली घनेरी जुल्फें अगर खोल ले तो जैसे घटा छा गई हो ऐसा लगे, जब चोटी बनाकर चलती तो मटकते नितम्बों पर बारी बारी से टकराती ! कद 5 फुट 3 इंच, फिगर 34-30-36 होगा, एक बच्चा होने के बाद भी उसके स्तन भरे हुए ठोस प्रतीत होते थे भरे और कसे हुए कठोर मौसंबी की तरह, लगता है हमारा साला इनका इस्तेमाल ही न करता हो ! पेट सपाट, कूल्हे चौड़े, उन पर पुष्ट मांसल गठे हुए नितंब, जो चलते समय ऐसे मटकते कि देखने वाला अपनी सुधबुध ही खो दे !
अगले दिन शाम को मैंने साले की ससुराल जाने का प्रोग्राम बनाया, साले के साले विनोद के लिए कुछ गिफ्ट और मिठाई पैक करवाए और अपनी छोटी क्लासिक जीप से निकल पड़ा। गाँव पहुँचने से पहले ही मैंने अपने अपने साले को बता दिया कि मैं रेखा को लेने निकल चुका हूँ, कुछ समय में पहुँच जाऊँगा, आप रेखा और उसके भाई विनोद को इत्तला दे दो ताकि वो लोग घर पर मिल जाएँ ! कुल सत्तर किलोमीटर की दूरी तय करके सूर्यास्त से पहले ही उनके गाँव पहुँच गया, गांव के बाहर ही सड़क से लगे विनोद के खेत थे जैसे ही वहाँ तक पहुँचा, दो महिलायें चारे का गट्ठा सिर पर रखे खेत से बाहर आ रही थी !
करीब गया तो रेखा और उसकी माँ को देख मैंने जीप रोक ली। रेखा ने शर्म से चारे का गट्ठा जमीन पर फेंक दिया। रेखा को गांव के लिबास में पहली बार देखा, पैरों में महावर लगा था, मोटी मोटी पायल, साड़ी घुटनों से थोड़ा नीचे, पिण्डलियों तक साड़ी का पल्ला फेंटा देकर कमर में कसा हुआ था, बिल्कुल नवयौवना सी, एकदम गांव की गोरी लग रही थी, बिल्कुल अल्हड़ बिंदास जैसे उसका बचपन लौट आया हो !
‘विनोद और नई बहू कहाँ हैं? मैंने पूछा।
तो रेखा मुस्कुराकर आँख मारते हुए बोली- वो घर पर हैं।
मैं समझ गया कि रेखा विनोद को अपनी पत्नी के साथ अकेले रहने के लिए पूरा मौका दे रही है क्योंकि रेखा के पिताजी का स्वर्गवास हो चुका है, उनके घर में रेखा के अलावा उसकी माँ और भाई ही हैं, मैंने उनके चारे के गट्ठे जीप में रख कर उन्हें बिठा कर उनके घर पहुँच गया !
विनोद और उसकी पत्नी सभी ने मेरी आवभगत की, मैंने उन्हें गिफ्ट और मिठाई का डिब्बा देते हुए शादी की बधाई देते हुए कहा कि रेखा को लिवाने आया हूँ, आप उसे मेरे साथ भेज दीजिए।
तो उन्होंने कहा- रात होने वाली है, आज तो आपको जाने नहीं देंगे, आप कल सुबह चले जाना !
सोच तो मेरी भी यही थी, तभी तो मैं शाम को आया था कि रात रुकने का मौका तो मिलेगा !
चाय नाश्ता देते हुए रेखा बोली- जीजाजी, रात में लाईट नहीं रहती, गाँव के मच्छर आज आपके मजे लेंगे !
वो बहुत उत्साहित थी, मैंने कहा- मैं भी तो तुम्हारे मजे लूँगा ! तुम याद रखना, रात में मेरे पास आना है।
बोली- मुझे तुम्हारे साथ जो आनन्द पिछली बार आया था, उसे मैं जिन्दगी भर भूल नहीं सकती। मेरी बातों से शायद वो उत्तेजित भी हो रही थी ! मेरा बहुत ध्यान रख रही थी तो जैसे मेरी हर जरूरत के लिए तत्पर थी ! गांव के बड़े से मकान में कुछ कर गुजरने के बहुत मौके थे, मैं निश्चिन्त हो गया, बहुत से लोग मिलने आये, बड़ा मजा आ रहा था !
खाना खाकर दस बजे तक गप्पे लड़ाते रहे, तभी लाईट चली गई जो सुबह पांच बजे आती है !
विनोद ने एक हालनुमा कमरे जिसमें बाथरूम भी था, में मेरा बिस्तर लगा दिया, बोला- मैं सोने जा रहा हूँ !
फिर वो ऊपर अपने शयनकक्ष में बहू के साथ चला गया। रेखा की मम्मी अन्दर के कमरे में जाते हुए रेखा से बोली- बेटी, जमाई को पानी रखकर तू भी आकर मेरे कमरे में सो जाना !
फिर रेखा ने मेरे लिए पानी लाकर रख दिया और लालटेन को अपने साथ कमरे में लेकर सोने चली गई !
मैं अँधेरे में करवटें बदलता रहा, फिर मेरी झपकी सी लग गई। अचानक मेरे गाल पर रेखा के होंठों ने दस्तक दी, वो मुझे चूमते हुए अपने एक हाथ को मेरे लोअर में घुसाकर मेरे लौड़े को सहलाने लगी !
मैंने पूछा- माँ सो गई क्या?
तो बोली- हाँ, अगर वो उठ भी जाएगी तो मैं बाथरूम गई थी, का बहाना बना लूँगी !
अब मैं निश्चिन्त हो गया, मैं अँधेरे में बड़ी मुश्किल से देख पाया कि रेखा ने मैक्सी पहनी है ! रेखा को मैंने अपने ऊपर खींच लिया फिर उसके जिस्म को सहलाना, मसलना शुरू कर दिया। उसने मेक्सी के नीचे पेंटी और ब्रा कुछ नहीं पहना था यानि पूरी तैयारी से आई थी !
मैंने उसकी ढीली ढाली मेक्सी गले से निकाल दी वो पूरी नंगी मेरे बदन से लिपट गई उसने मेरा लोअर, चड्डी-बनियान अपने हाथों से उतार दिया ! हम दोनों के नंगे जिस्म एक दूसरे में सामने के लिए बेकाबू हो रहे थे। रेखा के कड़क स्तन मेरी छाती में धंसे जा रहे थे उसके स्तन को पकड़कर दबाते हुए मैं निप्पल को अपने होंठों से दबाकर चूसने लगा, उसकी सांसें तेज हो गई, स्स्स्स करते हुए उसने मेरे सिर को अपने सीने में भींच लिया।
मेरा लंड पूरे उत्थान पर आ गया था जो अभी भी रेखा के हाथ में मसला जा रहा था। मैंने रेखा को 69 की पोजीशन में किया और
उसकी चिकनी उजली जांघों को सहलाने लगा जो अँधेरे मे भी चमक रही थी। आह्ह्ह… ओ… ह्ह्ह.. के स्वर मेरा उत्साहवर्धन कर रहे थे, उन्हें चूमते हुए उसकी पिंडलियों तक जीभ से भिगो दिया, फिर पिंडलियों से चूमते हुए गोल-गोल पुष्ट नितंबों तक आ गया। गांड के उभार कितने मस्त थे एकदम चौड़े चौड़े !
फिर उसकी टांगों को फैलाकर उसकी गीली हो चुकी योनि पर अपने होंठों को रख दिया, साबुन की महक से लगा कि उसने अभी योनि को धोया था। मैंने अपनी जीभ से उसकी फलकों को छेड़ दिया और अंगुली से उसके दाने को सहलाते हुए अंगुली उसकी चिकनी गीली बुर में घुसा दी।
उसकी किलकारी सी निकल गई- आईईइ… स्स्स स्स्स्स… जीजू… ओओह… अब मत तड़पाओ… डाल दो ना…
उसकी बुर से पानी निकलना शुरू हो गया था !
मैं उसे एक बार स्खलित करना चाहता था इसलिए अपने एक हाथ से उसकी गांड को सहलाते हुए बुर को चाटते चूमते उसके दाने को सहलाने लगा।
उसकी आवाजें ‘ओहूऊ… आऊऊ… स्स्स्स’ तेज होती जा रही थी, वो मेरे लंड को सहलाते हुए अपने होंठों में दबाकर चूसने लगी। मेरी अनुभूति को मैं बता नहीं सकता कितना आनन्द आ रहा था !
मैं भी तन्मयता से अपनी अंगुली से उसकी योनि की मस्त रगड़ाई करता रहा। तभी रेखा चरमोत्कर्ष प्राप्त कर गई, उसने अपनी टांगों को भींच लिया, तेज तेज सांसों को नियंत्रित करते हुए कह रही थी- आह्ह्ह्ह… हाँ… ओ… स्स्स्स.. बस… हो… गया बस… रुको… आह्ह मेरे लंड से बड़ी तेजी से अपना मुखचोदन करने लगी। जरा सी देर और हो जाती तो मेरा वीर्य से उसका मुँह भर जाता !
मैंने अपने लंड को उसके मुँह से निकाल लिया और उसके बराबर आकर लेट गया, वो मुझसे लिपट गई, बोली- जीजू, तुम्हारे साथ मिला यह आनन्द तुम्हारे साले साहब मुझे कभी नहीं देते, कुछ उन्हें भी सिखा दो !
मैंने कहा- उन्हें सिखा दूंगा तो तुम मुझे तो भूल ही जाओगी !
इसी लिपटाझपटी में मेरे लौड़े ने अपनी मंजिल को ढूंढ कर चूत के मुहाने पर दस्तक देना शुरू कर दिया। रेखा ने मेरे होंठों को अपने होंठों में दबाकर चूसते हुए एक हाथ से मेरे लंड को पकड़कर अपनी चूत में फंसा लिया फिर अपनी गांड को उचका उचका कर लंड को अन्दर और अन्दर करने लगी ! मैंने उसके दुग्ध कलश को सहलाते हुए उनका अमृतपान करते हुए लंड को पेलना शुरू कर दिया। लंड पूरा अन्दर तक बैठाकर जब बाहर निकालकर अन्दर पेलता तो उसकी चिकनी बुर की चिकनी दीवारों की रगड़ से मेरे सुपारा तो और भी फूल सा गया। हर झटके के साथ रेखा की मस्त आहें मेरे को भी मजा दे रही थी, वो तो बस हाँ… जीजू, …और जोरर्रर्र… से करो न
आह… फाड़ दो आज तो, कितने दिनों से मेरी बुर आँसू बहा रही है पर तुम्हारे साले साहब तो मुझे छोड़कर चले गए ! ओह्ह्ह… स्स्स्स…
पांच सात मिनट की धकापेल में हम दोनों सब कुछ भूलकर सम्भोग का अभूतपूर्व आनन्द उठाते रहे, दोनों पसीने से सराबोर हो गए ! रेखा तो नीचे से गांड को ऐसे उठाकर लंड पेलवा रही थी जैसे वो मेरे अंडकोष भी अपने अन्दर करवाना चाहती हो !
रोनी आह्ह्ह ! मेरी चूत को जन्नत का मजा दे दिया आपने ! आ आःह्ह… ओह्ह स्स्स्स !
इसी के साथ उसका बदन अकड़ने लगा, उसकी योनि से रसधारा निकल पड़ी ! योनि के संकुचन ने मेरे लंड को भी स्खलन की ओर अग्रसर कर दिया, मेरा वीर्य तेज धार के साथ उसकी बुर में भर गया, दोनों एक दूसरे को अपने आलिंगन में लेकर अपनी तूफानी सांसों को नियंत्रण करने की चेष्टा करने लगे !
पांच सात मिनट की धकापेल में हम दोनों सब कुछ भूलकर सम्भोग का अभूतपूर्व आनन्द उठाते रहे, दोनों पसीने से सराबोर हो गए ! रेखा तो नीचे से गांड को ऐसे उठाकर लंड पेलवा रही थी जैसे वो मेरे अंडकोष भी अपने अन्दर करवाना चाहती हो !
रोनी आह्ह्ह ! मेरी चूत को जन्नत का मजा दे दिया आपने ! आ आःह्ह… ओह्ह स्स्स्स !
इसी के साथ उसका बदन अकड़ने लगा, उसकी योनि से रसधारा निकल पड़ी ! योनि के संकुचन ने मेरे लंड को भी स्खलन की ओर अग्रसर कर दिया, मेरा वीर्य तेज धार के साथ उसकी बुर में भर गया, दोनों एक दूसरे को अपने आलिंगन में लेकर अपनी तूफानी सांसों को नियंत्रण करने की चेष्टा करने लगे !
फिर दोनों ने अपने को साफ किया और पलंग पर लेट गए उसके बाद फिर चूमा चाटी शुरू हो गई।
आधे घंटे बाद रेखा ने मेरे को लिटाकर मेरे लंड की बेहतरीन चुसाई की फिर मेरे कमर पर सवार होकर अपनी चूत में मेरे लंड को घुसाकर अपनों गांड को उठा उठाकर गपागप चुदवाई करने लगी।
मैंने भी उसके लटकते मचलते स्तनों का मर्दन करते हुए चूस चूस कर लाल कर दिए फिर दोनों के स्खलन के बाद पूर्ण संतुष्ट होकर रेखा अपने कमरे में जा कर सो गई !
रेखा ने सुबह आठ बजे मेरे को जगाया वो नहा धोकर तरोताजा हो चुकी थी, साड़ी ने तो उसकी खूबसूरती में चार चाँद लगा दिए थे।
मैंने कहा- चलने की तैयारी कर लो।
तभी वहाँ विनोद ने आकर कहा- खाना बन रहा है, खाने के बाद ही आप लोग जाना।
फिर वो गौशाला में जाकर गाय भैंस की सेवा में लग गया। गांव देहात में सब काम अपनी गति से चलते हैं। मेरे को मालूम था कि एक दो बजे से पहले निकलना नहीं हो पायेगा !
रेखा की माँ ने मुझे बोला- जमाई जी, आप नहा लो, फिर नाश्ता कर लेना।
तो मैंने कहा- मैं नाश्ता नहीं करूँगा, सीधा खाना ही खाऊँगा, तब तक आपके खेत पर बने कुएँ पर जाकर नहाकर आता हूँ। विनोद को साथ ले जाता हूँ, आप खाना तैयार कर लेना !
तो माँ बोली- विनोद को तो दो घंटा लग जायेगा जानवरों के चारा पानी करने में, आप रेखा को ले जाओ खेत पर ! खाना मैं और बहू मिलकर बना लेंगे !
मेरी योजना के मुताबिक मैं रेखा को लेकर खेत चला गया !
खेत पर कोई नहीं रहता था, कुआँ के पास ही वहाँ मकान के नाम पर एक कच्चा कमरा और उसके बाहर दहलन बनी हुई थी। रेखा ने
कमरे के दरवाजा का ताला खोला, वहाँ पर खेतीबाड़ी का सामान और एक के ऊपर एक दो बोरे अनाज के भरे हुए रखे थे, शायद बोवनी के लिए बीज रखा होगा।
कुएँ के पास जाकर मैंने कच्छे के अलावा सारे कपड़े निकाल दिए, रेखा ने अन्दर से रस्सा बाल्टी निकाली, बोली- चलो, मैं कुएँ से पानी निकाल देती हूँ, आप नहा लेना।
तो मैंने तुरंत कहा- रेखा भाभी, आप अपने कुएँ से पानी निकालो, मुझे भी तो अपने हैंडपंप से पानी निकलना है ! दोनों अपना पानी निकाल लेंगे, फिर हम नहा लेंगे !
रेखा मेरी बात को सुनकर मुस्कुराते हुए बोली- जीजू आप बहुत बदमाश हो ! कुएँ पर नहाना तो एक बहाना है, मैं तो तभी समझ गई थी !
रेखा बोली- कोई आ जायेगा तो?
मैंने उसे मकान का एक चक्कर चारों तरफ का लगवाया, सभी तरफ खेत ही खेत थे एक एक किलोमीटर दूर तक कोई दिखाई नहीं दे रहा था, अब ‘अगर कोई आएगा भी तो उसे यहाँ तक आने में आठ दस मिनट तो लगेंगे ही !’
कहकर मैंने उसे कमरे के अन्दर खींच लिया और किवाड़ की सांकल लगा दी।
उसे सीधा अनाज के बोरे पर लिटा दिया बोरे पर लिटाने से उसके दोनों टांगें जमीन पर टिकी हुई थी, पोजीशन बड़ी गजब बन गई थी, मैंने उसकी साड़ी को उतारना उचित नहीं समझा इसलिए कमर तक ऊपर उठा दिया तो उसकी नंगी चूत की झलक दिखाई देने लगी।
वो इस बात को पहले ही समझ गई थी, शायद इसीलिए उसने पेंटी नहीं पहनी थी।
मैंने दोनों टांगों को दायें बाएं फैलाया तो चूत की फांकें खुल गई, चूत पूरी तरह से गीली थी, दिन के उजाले में उसकी गुलाबी चूत को देख कर पलक झपकते ही मेरा लंड को खड़े होकर कठोर हो गया, समय की कमी के कारण मैंने चूत पर एक पप्पी लेकर कच्छा उतारा और अपने लंड को उसके छेद पर सेट करके धीरे से धक्का लगा दिया तो रेखा की आवाज निकली- आह्ह्ह… धीरे करो जीजू !
फिर पूरे लंड को अन्दर तक घुसा कर उसके चूचों को ब्लाउज के ऊपर से चूमते हुए मसलने, सहलाने लगा, उसके होंठों को अपने होंठों में लेकर चूसते हुए ठाप लगाना शुरू कर दिया, दिल में यह भी डर था कि कोई आ न जाये, इसलिए अपनी स्पीड बढ़ा दी, दोनों की कराहों से कमरे की शांति भंग होती रही।
फिर रेखा ने जोर से सिसकारियाँ लेते हुए अपना रजस्खलन किया तो चूत से आने वाली फच फच की आवाजों से मेरी उत्तेजना को बल मिला और मैंने भी अपने स्खलन के साथ मैंने अपनी मंजिल पा ली।
कुछ क्षणों बाद हम दोनों पृथक हो गए, मैंने दरवाजा खोलकर रस्सा बाल्टी उठाई और कुएँ पर पहुँच गया, फिर पानी निकालने का उपक्रम करते हुए आसपास का मुआयना करने लगा, सब ठीक था, मैंने रेखा को बाहर आ जाने को कहा।
फिर रेखा बाहर आई और बोली- मैं अपनी वो धोकर आती हूँ !
लोटे में पानी लेकर कुएँ की ओट में अपनी साड़ी को ऊपर कमर तक करके बैठ कर अपना योनि-प्रक्षालन करने लगी।
मैं नहाया फिर हम दोनों रेखा के घर पहुँचकर अपनी अपनी तैयारी में लग गए।
रेखा की माँ ने बहुत सा सामान पथोनी के रूप में रख दिया। अच्छा हुआ जो मैं जीप लेकर गया, सारा सामान जीप में रख दोपहर का खाना खाकर हम रेखा को लेकर रास्ते में मस्ती करते हुए मेरे साले के घर पहुँच गए।
मेरा साला बहुत खुश हुआ, बोला- जीजाजी आपने मेरी बहुत मदद की जो रेखा को लेने चले गए !
मैंने कहा- साले साहब, आपने पहली बार कहा था इसलिए चला गया, आगे से ध्यान रखना मेरे को अपने ही बहुत से काम होते हैं !

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