मुझ से भूल हुई

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टीवी पर आ रहे दृश्य से श्रद्धा को एक झटका सा लगा। उसने अपने पास ही बिस्तर पर बैठे जीजा को झिंझोड़ते हुए कहा- नरेन्द्र ! नरेन्द्र ! देखो !
टीवी पर एड चल रहा था… कल रात मुझ से भूल हुई… सावधानी नहीं ली… मैं गर्भवती होना नहीं चाहती… अनचाहे गर्भ को रोकने के लिए बहत्तर घंटे के भीतर गोली लें।
नरेन्द्र ने विज्ञापन खत्म होते ही पैरों में चप्पलें डाली और झपट कर मोटर साईकिल पर निकल गया, पास के मेडिकल स्टोर पर पहुँचा।
उसे बोलने की आवश्यकता नहीं पड़ी, स्टोर के काऊंटर के साथ की दीवार पर अनचाहे गर्भ को रोकने की गोली का पोस्टर लगा था। उसने पोस्टर की ओर इशारा कर दिया। फार्मासिस्ट ने एक पैकेट निकाला और नरेन्द्र के हाथ में पकड़ा दिया।
नरेन्द्र जिस तेज गति से मेडिकल स्टोर पर गया था, उसी तेज गति से लौटा। नरेन्द्र ने पैकेट श्रद्धा के हाथ में रख दिया। श्रद्धा ने पैक को खोल कर गोली निकाली और कुछ पल तकने के बाद पानी के साथ गटक ली। गोली निगलते ही उसे राहत महसूस होने लगी।
नरेन्द्र बोला- अब तुम तीन-चार घंटे आराम करो… तुम तीन बजे वाली ट्रेन से चली जाना।
श्रद्धा बिस्तर पर पसर गई। नरेन्द्र भी पास में ही लेट गया। इसी बिस्तर पर ही बीती रात को वे एकाकार हो गए थे।
नरेन्द्र की शादी विद्या से हुई थी। यह बेड शादी में उपहार में मिला था। विद्या के साथ प्रथम रात्रि यानि की सुहागरात इसी पर मनाई… और उसके बाद इसी पर ही मजे से हर रात बीत रही थी।
कुछ माह पहले विद्या अमरावती से डेढ़ सौ किलोमीटर की दूरी पर नागपुर में एक स्कूल में अध्यापिका लग गई। कुछ दिनों तक अप डाउन किया, मगर इसमें भारी परेशानी हुई तथा जाने आने में ही छह घंटे तक बीत जाते। इसके अलावा विभागीय निरीक्षण की सख्ती भी थी। उसने वहीं पर कमरा किराए पर ले लिया।
विद्या शनिवार को ड्यूटी कर शाम तक घर लौट आती। शनिवार शाम से सोमवार की भोर तक का समय व्यस्तता में बीतता। शनिवार शाम को घर लौटते ही विद्या और नरेन्द्र बाजार जाकर खरीदारी करते, खाते पीते और रात को बिस्तर पर नई प्रेमकथा तैयार करने में जुट जाते। रविवार का आधा दिन घरेलू कामकाज में बीत जाता। उसके बाद दोनों दो तीन घंटे सोकर थकान उतारते। भोजन बनाने खाने के बाद रविवार की आधी रात तक प्रेमकथा दोहराते।
इसके बाद विद्या पुन: ड्यूटी पर जाने की तैयारी में लगती। नरेन्द्र और विद्या करीब तीन बजे बस स्टेंड के लिए घर से मोटर साईकिल पर निकल पड़ते। बस की रवानगी भोर में चार बजे होती तब तक बस के आने का इंतजार करते। बस के इंतजार में खड़े अन्य यात्री विद्या को कनखियों से निहारते रहते। कई युवा तो इतने उद्दण्ड होते कि एकदम पास में आकर घूरते हुए निकलते। उनकी आँखों में शरारत झलकती जो कहती कि आओ, मेरी आँखों में होती हुई दिल में समा जाओ।
कुछ तो पास में आकर नरेन्द्र से टाइम पूछते- भाई साहब क्या बजा है? बस का राइट टाइम क्या है?
नरेन्द्र को भाई साहब संबोधित कर कुछ पलों के लिए विद्या को भाभी बना कर मन ही मन खुश हो जाते। विद्या कुछ दिन तक तो लोगों के इस व्यवहार से झुंझलाई मगर बाद में लापरवाह हो गई।
नरेन्द्र बस रवाना होने के बाद घर लौट आता। बस यही सामान्य सी जिंदगी हो गई।
सोमवार से शुक्रवार तक की अवधि में जब विद्या नहीं होती तब श्रद्धा आ जाती और एक दो रातें गुजार कर चली जाती। वह अमरावती से तीस किलो मीटर की दूरी पर चन्दूर में एक निजी कंपनी में क्लर्क की नौकरी पर लगी हुई थी, जहाँ से आना जाना आसान था। वह रात को आती और भोर में लौट जाती। फिर भी उसकी झलक आसपास की औरतों ने प्राप्त कर ही ली। यह भी मालूम कर लिया कि श्रद्धा नरेन्द्र की साली है।
पिछली रात श्रद्धा और नरेन्द्र ने बिस्तर को तृप्त किया और सुबह देर से उठे। दोनों ने नहा धोकर चाय नाश्ता किया। श्रद्धा टीवी देखने लगी थी, कि 72 घंटे के भीतर अनचाहे गर्भ को रोकने वाली गोली का विज्ञापन टीवी पर आने लगा। श्रद्धा को विज्ञापन से झटका सा लगा। युवती कह रही थी कल रात हम से भूल हुई… मैं अभी गर्भवती नहीं होना चाहती… इसी में अनचाहे गर्भ को रोकने के लिए गोली लेते हुए दिखाया भी गया था।
श्रद्धा और नरेन्द्र पूरी एहतियात बरतते, मगर बीती रात को कण्डोम नहीं था। विद्या के वस्त्रों के बीच में कण्डोम रखे होते थे। उन्हीं में से गुब्बारा लेकर फुला लेते थे। विद्या ने कभी गिनती नहीं की थी। दोनों ने सोचा एक रात गुब्बारा नहीं उड़ायेंगे, मगर इस निर्णय पर कायम नहीं रह पाए।
दोनों बिस्तर के दोनों किनारों पर सोए बीच में तकिया भी लगाया। पहले हाथ मिले और बाद में आई बाढ़ ने दोनों किनारों को एकाकार कर दिया। दोनों बाढ़ में बह चले। हां, नरेन्द्र की नजर बिस्तर के सिरहाने रखी मंढी हुई तस्वीर पर पड़ी। विवाह के तुरंत बाद की तस्वीर जिसमें वह और विद्या थे। नरेन्द्र को लगा कि विद्या की आँखें उसे और श्रद्धा को घूर रही है। उसने तस्वीर को पलट कर रख दिया था। उसके बाद बिस्तर का कोई भी दृश्य तस्वीर वाली विद्या ने नहीं देखा।
मगर श्रद्धा एड देख कर परेशान हो गई थी। उसे गोली खाने के बाद राहत मिली थी।
नरेन्द्र श्रद्धा को ट्रेन पर चढ़ा कर लौटा तो घर खुला पाया। उसे चिंता हो गई कि विद्या आज सप्ताह के बीच में कैसे लौट आई? वह जल्दी से कमरे में घुसा। विद्या बिस्तर पर नींद में मिली। नरेन्द्र की निगाह बेड के नीचे गई जहां पर 72 घंटे वाली गोली का खाली पैक पड़ा था। श्रद्धा की लापरवाही पर एक बार झुंझलाया। विद्या की नजर पड़ जाती तो…?
उसने खाली पैक को उठाया और बाहर फेंक आया। अब वह विद्या की नजरों के लिए साफ सुथरा बन गया था। वह भी नींद में बेसुध विद्या से चिपट कर सो गया।
दोनों जागे तब नरेन्द्र ने प्रश्रों की झड़ी सी लगा दी- तुम कब आई? इस वार को तो आती नहीं थी? कोई बात हो गई क्या?
विद्या बोली- आज बच्चों का मूड पढ़ने का नहीं था। मैं भी वहाँ रूकने के बजाय छुट्टी का मूड बना घर लौट आई। यहाँ पर गेट पर ताला लगा था, सोचा कि तुम किसी मित्र के यहाँ चले गए हो। ताला खोल कर भीतर आई और सोने के पहले कुछ खा लेने का मन किया। रसोई घर में कुछ ताजा बने होने की खूशबू आ रही थी, मगर मिला कुछ भी नहीं। मैंने चाय बनाई और पीकर सो गई।
चाय का नाम लेते ही पुन: चाय की याद आ गई, विद्या बोली- शाम हो गई है, मैं चाय बना कर लाती हूँ।
दोनों ने चाय पी और कामों जुट गए।
शाम को नरेन्द्र बालकनी में खड़ा इधर उधर देख रहा था। उसकी निगाह पड़ोस के घर के सामने पड़ी। पड़ोसन शर्मा जी की पत्नी और विद्या एक दूजे से बतिया रही थी। नरेन्द्र को लगा कि शर्मा की पत्नी साली के आने जाने के बारे में ही बता रही होगी।
नरेन्द्र शिकायत के बचाव में मन ही मन बहाना सोचने लगा। साली की चाहत ने पल भर में पत्नी से छल करने का मानस बना दिया। पत्नी घर में घुसी तब तक उसने मन ही मन में एक छल तैयार कर लिया। दो दिन बाद ही साली का जन्म दिन आने वाला था। साली के जन्मदिन की याद ने नरेन्द्र को बहुत बड़ी राहत दी।
विद्या के घर में घुसते ही नरेन्द्र बोल पड़ा- अरे… मैं तो तुम्हें बताना ही भूल गया ! श्रद्धा आई थी, वह जन्म दिन का निमंत्रण दे गई है।
उसे लगा कि विद्या यह सुन कर भी संतुष्ट नहीं हुई है तथा उसके दिल में शक समाया है। नरेन्द्र को करंट सा लगा जब विद्या ने पूछा- पिछले हफ्ते भी आई थी क्या?
नरेन्द्र को इस प्रश्न की आशा नहीं थी। नरेन्द्र ने बड़ी होशियारी से जवाब दिया- श्रद्धा आई जरूर थी, मगर तुम्हारे मौजूद नहीं होने पर वह रूकी नहीं। पानी पिया और खड़े पैर लौट गई। इसका क्या बताता।
नरेन्द्र ने कहा- तुम्हें किसने बताया? लगता है पड़ोसी एक एक मिनट की खोज खबर रखते हैं।
विद्या बोली- मुझे तो साथ के घर वाली शर्मा जी की पत्नी ने बताया।
नरेन्द्र का दिमाग तेजी से काम करने लगा था। उसने पत्नी पर विश्वास जमाने और शर्मा की पत्नी को झूठी साबित करने के लिए तुरूप का इक्का मारते हुए कुछ आक्रोश भरे शब्दों में कहा- वह कलूटी… चुगली खा रही थी… तो वह इतना गिर गई है कि बदला लेने पर तुल गई है।
नरेन्द्र के आक्रोश भरे शब्दों ने जादू का सा प्रभाव डाला, विद्या बोली- तुम्हारे साथ उसका कोई झगड़ा हुआ क्या? तुमने कभी बताया नहीं। किस बात का बदला लेगी वह?
नरेन्द्र बोला- उससे कोई झगड़ा नहीं हुआ। मगर मैं उसके व्यवहार के पीछे नहीं जाना चाहता। पड़ोस में रहना है। ऐसे ही कोई बात बढ़ जाएगी और लोग अपने अपने स्वार्थों से मतलब निकालेंगे। कोई उधर होगा तो कोई अपनी ओर होगा। नाहक ही बदनामी होगी। लोग भी मर्द को ही दोष देंगे।
विद्या बोली- इसका मतलब तो बात कोई गंभीर है जो तुमने मुझे बतलाई नहीं।
नरेन्द्र बोला- अरे तुम उसे गोली मारो… साली कुतिया। अरे…जब तुम यहाँ नहीं होती हो… तब उसके घर में चाय-चीनी खत्म हो जाती है। खासकर शर्मा जी नहीं होते… तब वह आती है और सीधे रसोईघर में घुस जाती है…जो मुझे कत्तई पसंद नहीं है।
कोई भी स्त्री दूसरी स्त्री को अपनी रसोई में डिब्बे संभालने की छूट नहीं देती। नरेन्द्र का तीर सही निशाने पर था। विद्या प्रभावित हुई और बोली- शर्मा की पत्नी इतनी घटिया होगी, यह तो कभी सोचा भी नहीं था। डोरे डाल रही है और पार नहीं पड़ी तो इस तरह की शिकायत करने पर ही उतर आई।
नरेन्द्र बोला- छोटी बहन बड़ी बहन के घर पर नहीं आयेगी तो फिर किसके आयेगी? तुम इस प्रकार की घटिया शिकायतों पर सोचना बंद करो। आओ, श्रद्धा के जन्म दिन पर जो उपहार देना है उसके बारे में सोचें।
नरेन्द्र ने विद्या को कमरे में बैठाया और स्वयं बाहर निकल आया। उसने सारे घटनाक्रम को जल्दी से मोबाईल पर श्रद्धा को बताया। उसे बता दिया कि जन्मदिन के निमंत्रण का बहाना मार कर बचाव किया है। इसके साथ में सलाह भी दे दी कि तुरंत ही बहन को जन्मदिन पर आने का निमंत्रण देकर विश्वास जमा दे।
कुछ ही देर में विद्या के मोबाईल की घंटी बजी, विद्या ने मोबाईल ऑन किया, विद्या बोल रही थी- हाँ श्रद्धा, बोल ! अच्छा… अच्छा… जन्मदिन है… तुम्हारे जीजाजी ने बता दिया… हम उपहार की ही चर्चा कर रहे थे। अरे…तू यह बता कैसी है? कई दिनों से मिली ही नहीं। आ जा ! दो चार दिन रह कर चली जाना… दफ्तर वफ्तर छोड़… दो चार दिन की छुट्टियाँ ही ले ले।
नरेन्द्र का बहाना यानि कि छल पूरा काम कर गया।
विद्या और नरेन्द्र के बीच में श्रद्धा को दिए जाने वाले उपहार के बारे में चर्चा हुई। विद्या कोई निर्णय नहीं ले पाई। नरेन्द्र के मन में साली के रूप में छिपी प्रेमिका को तोहफ़ा देने की चाहत ने निर्णय किया। सोने की अंगूठी दी जाए जो सदा उसकी अंगुली में रहती हुई शरीर को छूती रहेगी।
श्रद्धा के जन्मदिन पर पति पत्नी दोनों मुर्तिजापुर पहुँच गए, यहाँ पर विद्या और श्रद्धा का पैतृक निवास था। पिता की मृत्यु के बाद उनकी माता शांता और श्रद्धा यहाँ रहती थी। श्रद्धा नौकरी के कारण चन्दूर में कमरा किराए पर लेकर रहने लगी थी। वह माँ के पास यदा कदा आती रहती थी।
श्रद्धा ने घर में बने मंदिर में देव प्रतिमाओं के आगे घी का दीप प्रज्ज्वलित किया और भोग लगाया। सर्व प्रथम अपनी मां शांता को प्रसाद खिलाया।
विद्या बोली- अजब संयोग है… रसमाधुरी और राजभोग का प्रसाद…
श्रद्धा बोल पड़ी- जीजू को रसमाधुरी पसंद है और मुझे राजभोग… दोनों रस भरे।
वह खिलखिला पड़ी। श्रद्धा ने रसमाधुरी उठाई और नरेन्द्र को खिलाने के लिए उसके मुँह की ओर हाथ बढ़ाया। नरेन्द्र ने बीच में ही हाथ पकड़ लिया तो वह बोल पड़ी- जीजू ऐसे नहीं…मेरे हाथ से ही खानी पड़ेगी।
उसने रसमाधुरी नरेन्द्र के मुँह में ठूंस दी और तालियां बजाते हुए हंस पड़ी। यह कहानी आप अन्तर्वासना डॉट कॉम पर पढ़ रहे हैं।
नरेन्द्र ने भी राजभोग उठाया और श्रद्धा के मुँह में ठूंसने के लिए हाथ आगे बढ़ाया ही था कि विद्या बोल पड़ी- इतना बड़ा राजभोग मुँह में कैसे जाएगा?
नरेन्द्र हंसते हुए बोल पड़ा- चला जाएगा।
हंसी मजाक के बीच में विद्या ने सुनहरी मखमली डिब्बी खोली और उसमें से चमचमाती हुई अंगूठी निकाल कर नरेन्द्र के हाथ में ही थमा दी- तुम ही पहना दो… तुम्हारी प्यारी साली है… याद करेगी जीजा ने कितनी प्यारी सी गिफ्ट दी है।
नरेन्द्र ने अंगूठी श्रद्धा की अंगुली में पहनाई तब उसकी निगाहें श्रद्धा के चेहरे पर टिकी रही। श्रद्धा ने जीजा की तरफ नजरें टिका कर अंगूठी इस तरह से चूमी मानो अंगूठी नहीं जीजा ही हो।
नरेन्द्र और विद्या घर लौटे तो श्रद्धा भी साथ ही आ गई। श्रद्धा दो दिन रही। इस बीच विद्या के दिल और दिमाग में पड़ोसन शर्माजी की पत्नी की शिकायत गूंजती रही। नरेन्द्र और श्रद्धा सावधानी बरतते रहे जिससे कहीं भी यह झलक तक नहीं मिली कि दोनों के बीच में कुछ है। विद्या बिना पुष्ट सबूत के अपनी बहन और पति को कुछ कहती तो हंसी का पात्र बनती। वह चुप रही। उसने कहना तो दूर रहा इशारा तक नहीं किया। उसके दिल में शर्माजी की पत्नी की एक ही बात बार बार चोट करती कि तुम्हारी बहन प्राय: आती है और अब तो रात को नहीं दिन में भी आने लगी है।
विद्या ने सोचा कि शर्मा की पत्नी को तो कोई लाभ हानि नहीं है। वह झूठी शिकायत क्यों करेगी? इस बार तो शर्माजी की पत्नी ने साफ साफ ही कह दिया- मैं तुम्हारे ही भले की कह रही हूँ। समय रहते चेत जाना ठीक है। कहीं बाद में पछताना ना पड़े।
विद्या को बातें करते हुए काफी समय बीत गया तब शर्मा की पत्नी ने कहा- कहो तो आंवला पानी बना दूँ… मीठा नमकीन जैसा तुम चाहो। चाय आदि तो हम पीते नहीं हैं। आंवला भिगो देते हैं और उसी का पेय बना लेते हैं। बड़ा स्वादिष्ट बनता है।
विद्या ने मीठा नमकीन तो सुना ही नहीं उसका सिर तो इतना सुन कर ही चकराने लगा कि दोनों चाय पीते ही नहीं है। नरेन्द्र ने तो कहा था कि शर्मा की पत्नी चाय-चीनी लेने आ जाती है और खास कर शर्मा नहीं होते तब चाय चीनी खत्म होती है, वह सीधे रसोई में घुस जाती है। इसका मतलब है कि नरेन्द्र ने इतना बड़ा झूठ बोला। इसके बावजूद विद्या को विश्वास नहीं हुआ और पूछ बैठी- क्या सच में आप चाय नहीं पीते?
शर्मा की पत्नी ने कहा- हम दोनों ही चाय नहीं पीते।
विद्या का सिर दर्द होने लगा। नरेन्द्र ने श्रद्धा और अपने संबंधों की शिकायत को झुठलाने के लिए इतना बड़ा झूठ बोला और शर्मा की पत्नी के चरित्र पर कीचड़ मलने में जरा भी संकोच नहीं किया। विद्या के सामने से एक बहुत बड़ा परदा हट गया। उसे नरेन्द्र और श्रद्धा के संबंधों पर घिन आने लगी। वह घर आई और सिर पर रूमाल की पट्टी बांध कर सो गई।
विद्या के दिल में यह तो साफ हो गया कि नरेन्द्र बड़ी सफाई से झूठ बोल कर बच जाता है। उसने बहुत सोचा और निर्णय किया कि किसी दिन अचानक घर पर पहुँच कर देखा जाए।
विद्या ने स्कूल में से श्रद्धा के दफ्तर फोन किया। उधर से चपरासी बोला तो विद्या ने श्रद्धा से बात कराने का कहा। वहाँ जवाब मिला कि श्रद्धा तो आज आई ही नहीं। चपरासी श्रद्धा के दफ्तर न आने का कोई भी कारण नहीं बता सका।
विद्या को पड़ोसन की बात सच सी लगने लगी। उसके मन में आशंका होने लगी कि श्रद्धा नरेन्द्र के पास ही हो सकती है। विद्या ने नरेन्द्र के मोबाईल पर रिंग दी मगर स्विच ऑफ मिला। श्रद्धा के मोबाईल पर रिंग दी मगर उसकी ओर से भी कोई उत्तर नहीं आया। उसका शक मजबूत होने लगा। उसके मुँह से अनायास ही निकल पड़ा- नरेन्द्र ने मोबाईल बंद कर रखा है और बहन उत्तर ही नहीं दे रही। उसके मन में कुछ बाकी नहीं रहा।
वह नान स्टॉप बस में सवार हो कर लौटी। टू सीटर टैंपों को फुल किराए पर करके घर तक पहुंची। टू सीटर को घर से कुछ दूर ही रूकवाया ताकि उसके शोर से नरेन्द्र और श्रद्धा चौकन्ने ना हो जाएँ। वह पैदल ही घर पहुँची। मुख्य गेट को धीमे से खोल कर भीतर घुसी और चप्पलों को वहीं उतार दिया। आंगन के दरवाजे को धकेला तो वह बंद मिला। उसने दूसरी चाबी से ताला खोला। शयनकक्ष में झांका। नरेन्द्र बिस्तर पर निद्रामग्न था।
उसने वस्त्र बदले और बेड पर जा बैठी। उसका बैठना हुआ कि नरेन्द्र के मुँह से शब्द निकले- श्रद्धा, नींद नहीं आ रही है क्या?
विद्या को झटका लगा, वह बोली- मैं श्रद्धा नहीं विद्या हूँ। नींद में भी पीछा नहीं छोड़ती…प्यारी साली।
विद्या के शब्दों ने नरेन्द्र की नींद उड़ा दी।
नरेन्द्र बड़े विनम्र शब्दों में बोला- तुम तो नाहक शक कर रही हो। उस कलूटी ने शिकायतें कर कर के तुम्हारा दिमाग खराब कर दिया है। जिससे तुम अपनी बहन पर ही शक करने लगी हो। काश तुम्हें श्रद्धा के हाल का पता चला होता। श्रद्धा सुबह से आई हुई है। वह उल्टी दस्त से बुरी तरह से परेशान थी। उससे चला तक नहीं जा रहा था। निजी क्लिनिक में डाक्टर को दिखलाया। दवाइयों के बाद हालत कुछ सुधरी है। वह दूसरे कमरे में सो रही है। मैंने सोचा कि श्रद्धा को नींद नहीं आ रही है और वह बेड पर आकर बैठ गई होगी। मेरे मुँह से इसलिए उसका नाम निकल पड़ा और तुम शक कर बैठी।
नरेन्द्र का शातिर दिमाग नए नए छल रचने में माहिर हो गया था। उसे मालूम पड़ चुका था कि विद्या को दोनों पर पूरा शक हो चुका है तथा मामूली सी भूल या गलती से कभी भी पकड़ में आ जायेंगे।
उसने श्रद्धा के आते ही बीमारी के बहाने का यह छल सोच लिया था। वह श्रद्धा को लेकर निजी क्लिनिक में पहुँचा और उल्टी दस्त का होना बताया। सभी जानते हैं कि इसमें रोगी के कथन पर ही डाक्टर विश्वास कर लेता है। डाक्टर ने उसके कथन के अनुसार दवाइयाँ लिख दी और आराम करने का कह दिया। सारी दवाइयाँ 60 रूपए में आ गई। श्रद्धा का साथ और विद्या के दिमाग में बहाना फिट करने के लिए यह कीमत तो कुछ भी नहीं थी।
चाय का बहाना तार तार हो जाने के बाद यही लगा कि नरेन्द्र फिर कोई बहाना ही रच रहा है। लेकिन बहन की बीमारी का सुन कर वह उसे संभालने को तत्पर हो उठी।
विद्या ने जल्दी से दूसरे कमरे का दरवाजा धकेला। दरवाजा भीतर से बंद था। उसने खिड़की में से झांका। श्रद्धा फर्श पर बिछी दरी पर सो रही थी। उसके पास में ही दवाओं के कुछ खाली रेपर भी पड़े थे। विद्या ने दरवाजा बजाया तो श्रद्धा ने खोल दिया।
विद्या ने पूछा- श्रद्धा, तुम्हारी तबीयत कैसी है?
छल में भागीदार बनी श्रद्धा ने थके शब्दों में कहा- बार बार टायलेट तक जाते जाते थक गई हूँ… कुछ ठीक हूँ…नींद आ रही है।
विद्या छल पकड़ नहीं पाई और बोली- तुम बहुत थकी हुई लग रही हो… सो जाओ।
श्रद्धा और नरेन्द्र उल्टी दस्त के बहाने पर हंसते हंसते बिस्तर पर एकाकार हुए थे और बाद में श्रद्धा दूसरे कमरे में जाकर लेट गई थी। अचानक पहुँचने के बावजूद भी विद्या के हाथ कुछ भी नहीं लगा।
विद्या का व्यवहार कुछ दिनों से लगातार अटपटा पाकर एक दिन मुख्याध्यापक रजनीश ने कहा- विद्या, कुछ दिनों से तुम परेशान नजर आ रही हो, बच्चों को पढ़ाने में भी तुम्हारा ध्यान नहीं है, कुछ बताओ क्या हुआ? संभव है मेरी भागीदारी से तुम्हारी परेशानी का कोई हल निकल जाए… कहते हैं कि परेशानी बांटने से जी हल्का हो जाता है।
“सर, मैं उलझन में फंसी हूँ… बात ही कुछ ऐसी है कि… !!” वह बीच में ही रूक गई।
रजनीश ने कहा- तुम अभी नहीं बताना चाहती हो तो मत बतलाओ… मेरे घर चलते हैं… वहां अपना जी हल्का कर लेना। हो सकता है जिस बात को लेकर तुम परेशान हो, वह कुछ भी ना हो… उसका मतलब ही कुछ और निकले।
मुख्याधयापक रजनीश के घर पर विद्या फफक पड़ी। उसने अपने पति और छोटी बहन को लेकर पड़ोसन की कही बातें एक एक कर बतला दी। यह भी बतला दिया कि वह प्रयास करके भी पकड़ नहीं पाई है। लेकिन यह सच है कि उसकी गैर मौजूदगी में दोनों मिलते हैं।”विद्या, तुम्हारी बहन का तुम्हारी अनुपस्थिति में बार बार तुम्हारे घर पर जाना और तुम्हारे पति से मिलना शंका तो पैदा करते ही हैं…” रजनीश बोले- पड़ोसन की बातों में कुछ दम तो है, उन्हें नकारा भी नहीं किया जा सकता।
इन शब्दों से विद्या की भावनाओं को और बल मिला।
विद्या रजनीश के सीने से लग रोने लगी और मुख्याध्यापक विद्या की पीठ को सहलाते हुए दिलासा देने लगे कि सब कुछ ठीक हो जाएगा। रजनीश की भावनाओं में उथल पुथल मच गई। उन्हें लगा कि उनके हाथ विद्या की पीठ को नहीं बल्कि एक खूबसूरत युवती के मादक बदन को सहला रहे हैं। विद्या भी स्पर्श के सुखद अहसास में सब कुछ भूल गई। दोनों सहज में ही पैदा हुए झरने के जल प्रवाह में बहने लगे। भीगने के शीतल अहसास से विद्या की पलकें मुंदती चली गई।
उसकी आँखें खुली तो स्वयं को रजनीश की बाहों में पाया। उसके बदन पर कपरे के नाम पर एक धागा भी था, उसकी योनि से रजनीश का तरल बह कर चादर पर एक धब्बा बना चुका था, दिखने में यह धब्बा चादर पर था पर विद्या सोच रही थी कि असल में यह धब्बा उसके चरित्र पर है !
वह उठने लगी मगर उठ नहीं पाई। बोलने की कोशिश की मगर बोल नहीं पाई। उसके दिल में एक आवाज आई कि श्रद्धा और नरेन्द्र भी तो यही कर रहे हैं… यह तो अनुचित हो रहा है, मगर यह आवाज शक्तिहीन सी रही और विद्या की आँखें पुन: मुंदती चली गई।
सारी रात वह मदहोशी में रही। सुबह आँख खुली तब होश आया। वह और रजनीश एक ही बिस्तर पर थे। वह उनसे चिपटी हुई थी। विद्या ने उनका हाथ अपने बदन से हटाया और अपने वस्त्रों को संवारा।
वह रजनीश को सोता हुआ छोड़ कर जल्दी से बाहर निकल पड़ी।
वह अपने किराए के कमरे पर पहुंची और स्नानघर में समा गई। काफी देर तक अपने बदन को रगड़ रगड़ कर नहाती रही। रजनीश के छूने का जहां जहां अहसास हुआ। वहां वहां बार बार साबुन लगाती रही…रगड़ती रही। मन ने कहा – कहां कहां पर रगड़ती रहेगी…क्या सारे बदन को ही रगडऩा नहीं पड़ेगा? उसके हाथ रूक गए।
वह नहा धोकर तैयार हुई और उसके पांव एक बार फिर रजनीश के घर की ओर ही बढ़ चले। न जाने कौनसा आकर्षण उसी ओर खींचता ले जा रहा था। वह उनके शयन कक्ष में ही चली गई।
वे टीवी पर कोई नृत्य गीत देखने में मग्न थे। उन्होंने विद्या की तरफ देखा। उसकी आँखों में एक प्रश्न तैरता हुआ नजर आया …एक पीड़िता को सांत्वना देने के नाम पर तुम्हारा चरित्र भी तार तार हो गया।
रजनीश को लगा कि विद्या कुछ देर और सामने रही तो सुन्न होते चले जाऐंगे। उन्होंने कहा- विद्या, कल मैं बहक गया था… मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था… मैं दोषी हूँ… तुम जो चाहे भला बुरा कह सकती हो… पत्नी की मौत के बाद वर्षों तक एकाकी जीवन में रह गया… मगर कल न जाने मैं कैसे पागल बन गया। मैं अब यहाँ से चला जाऊँगा।
विद्या बोल पड़ी- नहीं सर, मैं बहक गई थी। मैं दोषी हूँ। काश मैं आपके घर नहीं आती। मैं चली जाऊँगी अपने घर… मुझे क्षमा कर देना… आपके आचरण और स्कूल के अनुशासन का लोग उदाहरण देते हैं… वे कायम रहें। विद्या रजनीश के सीने से लग कर रो पड़ी। वे भी सुबक पड़े।
इसके बाद दोनों स्कूल पहुँचे। विद्या ने त्यागपत्र लिखा। मुख्याध्यापक रजनीश ने तुरंत ही स्वीकृति दी। विद्या ने किराए का कमरा खाली किया और बस से घर के लिए रवाना हो गई।
विद्या घर के आगे टैंपो से उतरी ही थी कि ठीक उसी समय श्रद्धा ने एक पैकेट बाहर फेंका। विद्या ने श्रद्धा को पैकेट फेंकते हुए और श्रद्धा ने विद्या को टैंपो से उतरते हुए देख लिया।
श्रद्धा गेट से बाहर निकलते हुए बोल पड़ी- दीदी…
यह आवाज सुन कर नरेन्द्र भी बाहर निकल आया।
विद्या ने फेंका हुआ पैकेट उठा लिया था। यह 72 घण्टे वाली गोली का खाली पैक था।
श्रद्धा नरेन्द्र व विद्या की आँखें मिली मगर कुछ सूझने के बजाय अंधेरा छाया था।

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