मज़ा आ गया

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कहानी : शबनम
सम्पादक : अरविन्द कुमार
मैं हमेशा अपनी बचपन की सहेली जेनेलिया के सम्पर्क में रहती हूँ।
हालाँकि वो गोआ में रहती है पर हम हमेशा बातें करती हैं और एक दूसरी को मेल भेजती रहती हैं।
आपको बता दूँ कि वो मेरी चुदाई की गुरु है और हमने कई बार आपस में लेस्बीयन सेक्स यानि समलिंगी चुदाई की है।
मैंने अपनी चुदाई का पहला सबक उस से ही सीखा था, जब हम दोनों जवानी में कदम रख ही रही थी, किशोरावस्था में थी।
उसने मेरे साथ लेस्बीयन चुदाई करके मुझे चुदाई के बारे में सिखाया था।
जब भी मैं गोआ जाती हूँ, मैं जेनेलिया से ज़रूर मिलती हूँ और हम एक दूसरी के नंगे और सेक्सी बदन से खेलते हुए लेस्बीयन चुदाई ज़रूर करती हैं।
हालाँकि वो और मैं दोनों ही लेस्बीयन नहीं हैं पर हम दोनों ही आपस में लेस्बीयन चुदाई करके बहुत आनन्द लेती हैं.
मेरी जिंदगी में जेनेलिया का एक विशेष स्थान है।
एक बार, जब मैं उसके साथ बात कर रही थी तो हमेशा की तरह हमारी बातें चुदाई के रोमांच के बारे में होने लगी।
उसको पता है कि मुझे रोमांच से भारी चुदाई बहुत पसंद है।
वो जानती है कि मैंने कई बार सार्वजनिक जगहों पर चुदवाया है और वो भी बिना किसी को पता चले।
मैं बहुत से लोगों के बीच में चुदवा लेती हूँ और किसी को भी पता नहीं चल पाता इसलिए हम दूसरे लोगों की मौज़ूदगी में किस तरह चुदवाया जा सकता है, इसके बारे में बात कर रही थी।
मुझे पता है कि अगर मैं उसको किसी तरह का चैलेंज़ दूँ तो वो उसको ज़रूर पूरा करेगी।
इसी तरह मैं भी इस तरह के चैलेंज़ लेने में पीछे नहीं हूँ इसलिए इस बार उसने मुझे किसी बड़े बाज़ार के लेडीज़ वॉशरूम में खुद ही अपनी फ़ुद्दी में उंगली करके झड़ने का चैलेंज़ दिया।
मैंने इसके बारे में ज़्यादा ना सोचते हुए उसका चैलेंज़ कबूल किया।
वो जानती है कि मैं झूठ नहीं बोलती और उसको वही सच बताऊँगी कि मैं उसके चैलेंज़ को पूरा कर पाई या नहीं।
फिर हम अलग अलग विषयों पर बात करने लगी।
आख़िर कुछ दिनों बाद मैंने उसको बताया कि अब उसके चैलेंज़ को पूरा करने का वक़्त आ गया है और मैं इसके लिए तैयार हूँ।
मैंने उसको बताया कि अगले दिन मैं एक सुपर बाज़ार जा रही हूँ और वहाँ उसके द्वारा दिए गये चैलेंज़ को पूरा करने की कोशिश करूँगी।
वो यह जान कर बहुत खुश हुई।
मैंने दिल्ली के एक सबसे बड़े सुपर बाज़ार में इस काम को अंजाम देने की सोची, जहाँ कार पार्किंग की बहुत अच्छी सुविधा है।
अंदर से यह सुपर बाज़ार कई मंज़िला है, कई बड़ी बड़ी दुकानें हैं और इसका अधिकतर भाग वातानुकूलित है।
अंदर दोनों तरफ सीढ़ियाँ और लिफ्ट है।
अपने प्रोग्राम के अनुसार मैं अगले दिन दोपहर को, जब मेरे पति दोपहर का खाना खा कर वापस ऑफ़िस चले गये, मैं अपनी कार में बैठ कर सुपर बाज़ार की तरफ रवाना हुई।
मैंने अपनी कार एक तरफ पार्क की और कार से बाहर निकली। मैंने अपना पसंदीदा स्कर्ट और टॉप पहन रखा था।
मैं सुपर बाज़ार के दरवाजे की तरफ बढ़ी और मैं यह सोच कर रोमांचित होने लगी कि मैं वहाँ क्या करने जा रही हूँ।
मैं इस अनोखे खेल और चैलेंज़ के लिए पूरी तरह तैयार थी।
मेरा टॉप मेरी चूचियों को ढकता हुआ मेरी कमर तक था। मेरा स्कर्ट, मेरी कमर पर, काफ़ी आरामदायक और मेरे घुटनों के ऊपर तक आ रहा था।
मेरे टॉप से मेरे नंगे कंधे और दोनों हाथ बाहर थे। मेरे स्किटर से भी मेरी घुटनों तक नंगी सेक्सी टांगे झाँक रही थी।
स्कर्ट कुछ इस डिज़ाइन में सिला हुआ था कि जब भी मैं चलती थी।
वो मेरी मस्तानी गाण्ड के दोनों तरफ झूलने लगता।
मैंने अपने सफेद सैंडल और मैंचिंग गहने, कान की बालियाँ, कलाई पर ब्रेस्लेट, गले में सोने की खूबसूरत चेन पहनी थी और मेरे हाथ में सफेद रंग का पर्स था।
अंदर पहुँच कर मैं शांत रहने की कोशिश कर रही थी, मेरे काले, घने खुले बाल मेरे नंगे कंधों पर झूल रहे थे और बार बार मेरी चूचियों के ऊपर आकर मुझे और भी रोमांचित कर रहे थे।
अंदर एयरकण्डीशन होने की वजह से वातावरण काफ़ी ठंडा था और मैंने महसूस किया की मेरे चुचूक ठंडक को महसूस करके कड़क हो गए थे, खड़े हो गए थे।
लेकिन मेरे टॉप के अंदर, चूचियों के ऊपर नर्म कपड़ा सिला हुआ था जिसकी वजह से किसी भी देखने वाले को पता नहीं चल रहा था कि मेरी निप्पल तनी हुई हैं। पर मुझे पता चल रहा था और मेरी चूचियाँ, मेरी निप्पल कपड़े के अंदर रगड़ खा रही थी।
मुझे यह बहुत सुखद लगा।
मैं दूसरी मंज़िल पर पहुँची जहाँ मुझे पता था कि एक बहुत अच्छा, सॉफ सुथरा लेडीज़ रेस्ट रूम है।
मैं वॉशरूम के अंदर दाखिल हुई, वहाँ अंदर काफ़ी सारी औरतें थी, कुछ जवान, कुछ थोड़ी उमर वाली और कुछ हसीन और जवान लड़कियाँ भी थी।
कुछ साड़ियाँ पहने हुए थी, कुछ ड्रेसेज़ पहने थी और कुछ बरमूडा, स्कर्ट और टॉप पहने हुए थी। लग रहा था जैसे हुस्न का बाज़ार लगा था।
नंगी सेक्सी टांगें, कपड़ों के अंदर से झाँकती हुई छोटी, बड़ी और कुछ बहुत बड़ी चूचियाँ।
उन सब के अलग अलग अंगों पर पहने हुए गहनो की खनख़नाहट और पैरों में पहनी हुई चप्पल और सैंडल्ज़ की आवाज़ें रेस्ट रूम में गूँज रही थी।
करीब करीब सारी औरतें और लड़कियाँ अपना मेक-अप ठीक कर रही थी।
मैं भी सामान्य रहने की कोशिश करते हुए शीशे में देख कर अपने बाल ठीक करते हुए बाकी की महिलाओं को, लड़कियों को देखने लगी।
कुल मिला कर वहाँ उस समय करीब दस औरतें और लड़कियाँ होंगी।
मैं सोच रही थी कि कैसे अपने काम को अंजाम दूँ?
अगर किसी को पता चल गया तो क्या होगा?
क्या इतनी भीड़ में, उनके बीच में मैं अपनी चूत में उंगली कर पाऊँगी?
पर अब मैं पीछे नहीं हट सकती थी, मैंने चैलेंज़ पूरा करने की ठान ली।
मैंने देखा कि एक करीब 45 साल की औरत मेरी तरफ देख कर मुस्करा रही है लेकिन मेरे पास ज़्यादा सोचने का वक़्त नहीं था।
यह समय सोचने का नहीं, काम करने का था।अपनी चूत में खुद ही उंगली डाल कर, हस्तमैथुन करके झड़ने का चैलेंज़ पूरा करने का समय था।
काफ़ी सारी औरतें आपस में तेज आवाज़ में बातें कर रही थी, कुल मिलकर काफ़ी शोर गुल हो रहा था और मेरे लिए यह अच्छी बात थी कि उस शोर-गुल में शायद मेरे द्वारा, हस्त मैथुन के दौरान की गई आवाज़ें किसी को सुनाई ना दे।
मैंने पीछे बने स्टॉल की तरफ देखा। बीच के तीन स्टॉल्स खाली थे।
मैंने अपने काम के लिए बीच वाला स्टॉल चुना।
मैंने अंदर आकर दरवाजा बंद किया और घूमी।
अंदर बहुत कम जगह थी।
जैसा कि आम तौर पर होता है, ज़मीन और स्टॉल की लकड़ी की दीवारों के बीच करीब एक फुट की दूरी थी. यानि तीन तरफ, दोनों साइड, अगल बगल के स्टॉल की तरफ और सामने दरवाजे की तरफ, बाहर की तरफ नीचे एक फुट की खाली जगह थी, जो भी अंदर होती है, वो अपने दोनों तरफ के स्टॉल में नीचे से झाँक सकती है।
हे भगवान! मैंने अपने स्कर्ट के अंदर हाथ डाल कर अपनी चड्डी को उतारा तो पाया कि मेरी चड्डी मेरे योनिरस से गीली हो चुकी थी।
मैंने अपनी चड्डी को अपनी नाक के पास करके अपनी चूत रस की सुगंध को सूँघा।
बहुत सेक्सी सुगन्ध है मेरे योनिरस की…
मैं सोच रही थी की उस छोटी सी जगह में अपने काम को किस तरह अंजाम दिया जाए।
मैंने दरवाजे के पीछे लगे हुक पर अपनी चड्डी टांगी और टायलेट सीट पर बैठी। अपनी स्कर्ट को गंदी होने से बचाने के लिए उसको अपनी कमर तक उठा कर दबा लिया।
फिर मैंने महसूस किया कि टायलेट सीट पर बैठे बैठे मैं अपना काम ठीक से नहीं कर पाऊँगी।
मैं जितना हो सकता था उतनी आगे होकर बैठी।
तभी, बगल के स्टॉल में एक औरत आई, मैं स्थिर हो गई, नीचे से उसके पैर दिख रहे थे।
मैंने उसकी चड्डी नीचे करने की सरसराहट सुनी और साफ साफ उसके मूतने की आवाज़ सुनी।
मुझे और गर्म होने के लिए इतना काफ़ी था।
मैं सोच रही थी कि बाहर इतनी आवाज़ें होने के बावजूद जब मैंने बगल के स्टॉल में उस औरत के मूतने की आवाज़ सुन ली तो मेरे द्वारा भी किसी भी प्रकार की आवाज़ भी सुनी जा सकती है।
लेकिन कुछ भी हो, मुझे मेरा वो काम तो करना ही था जिसके लिए मैं वहाँ आई थी।
आगे खिसक कर बैठने की वजह से मुझे कुछ परेशानी हो रही थी तो मैंने अपना एक पैर सामने दरवाजे पर टिकाया। पैर में सैंडल होने की वजह से लकड़ी के दरवाजे पर पैर टिकाने से आवाज़ हुई।
मैंने महसूस किया की बगल के स्टॉल में मूतने आई औरत की हलचल बंद हो गई है। शायद वो, मेरे स्टॉल में क्या हो रहा है, यह सुनने की कोशिश कर रही है।
भाड़ में जाए वो, सुनती है तो सुनती रहे, मैंने अपने मन में सोचा।
मैंने पूरा ध्यान अपनी चंचल, चिकनी चूत पर लगाया और अपनी रसीली चूत की दरार में अपनी उंगली फिराई।
मेरी चूत तो जैसे टपक रही थी।
मैंने बगल के स्टॉल से टायलेट पेपर खींचे जाने की आवाज़ सुनी और फिर उसके रगड़े जाने की आवाज़ भी सुनी।
शायद वो औरत टायलेट पेपर को अपनी फ़ुद्दी पर रगड़ कर अपनी फ़ुद्दी साफ कर रही थी।
अचानक ही, जब मेरी उंगली मेरी चूत के तने हुए गर्म दाने से टकराई तो ना चाहते हुए भी मेरे मुँह से आह की आवाज़ निकल गई।
बगल के स्टॉल से टायलेट पेपर को चूत पर रगड़ने की आवाज़ आनी अचानक रुक गई।
मैंने अपने मन में सोचा कि जो होगा देखा जाएगा, किसी को पता चलता है तो चलता रहे, मुझे तो अपना काम पूरा करना था।
अपना चैलेंज़ पूरा करना था।
खुद ही अपनी चूत मसल कर, उंगली डाल कर हस्तमैथुन करते हुए मुझे झड़ना था। आवाज़ होती है तो होती रहे।
मैं फिर अपने काम में मगन हो गई।
अपनी रसीली मस्तानी चूत में मेरी उंगली घूमने लगी और ना चाहते हुए भी मेरे मुँह से आनन्द की धीमी धीमी आवाज़ें निकलने लगी।
मेरे योनि रस की सुगंध अब अपने आप ही मेरी नाक तक पहुँच रही थी।
मेरी चूत काफ़ी गीली होने की वजह से जब मेरी उंगली उसके अंदर-बाहर हो रही थी तो उस से भी कुछ आवाज़ होने लगी।
मैं काफ़ी गर्म हो चुकी थी, मेरी आँखें बंद हुई जा रही थी और मुझे लगा कि मैं अपने झड़ने के काफ़ी करीब हूँ। मेरी साँसें तेज तेज चलने लगी और मेरा बदन झड़ने से पहले अकड़ने लगा, मेरे हाथ की रफ़्तार मेरी चूत पर और भी बढ़ गई।
दराज पर मेरे पैर के टकराने से दरवाजा हिलने लगा था और अब कुछ भी मेरे बस में नहीं था।
बाहर से आने वाली आवाज़ों में अचानक कमी आई और हे भगवान! बाहर खड़ी औरतें, लड़कियाँ मुझे सुन रही थी और शायद उनको अंदाज़ा हो गया था कि अंदर मैं क्या कर रही हूँ।
लेकिन इन सब की परवाह करने के लिए अब काफ़ी देर हो चुकी थी और मैं ऐसी हालत में थी, जहाँ से लौटना या वहीं रुकना मेरे बस में नहीं था।
मैं अपने झड़ने की चरम सीमा पर थी और अब कुछ नहीं हो सकता था।
मुझे आगे ही जाना था, पीछे वापस आना या रुकना मुमकिन नहीं था।
और अचानक ही, जैसे कि मैं जानती थी, मैं एक झटके के साथ ज़ोर से झड़ गई और उत्तेजना के मारे मेरा पैर ज़ोर से दरवाजे से टकराया तो दरवाजा हिल गया।
मैं तो ऐसे झड़ी थी कि रुकने का नाम नहीं ले रही थी।
मैं, जब तक हो सका, अपनी गीली चूत मसलती रही, उंगली करती रही।
पता नहीं मैंने अपनी चूत में उंगली करते वक़्त उत्तेजना में क्या क्या किया, कितनी आवाज़ें निकाली, मुझे कुछ याद नहीं था।
बाहर एकदम खामोशी छाई थी!
क्या सब औरतें और लड़कियाँ चली गई है?
तभी मैंने महसूस किया कि बाहर का दरवाजा खुला और कुछ लड़कियाँ बातें करती हुई वॉशरूम में आई और अचानक ही चुप हो गई।
हे भगवान! इसका मतलब सब की सब औरतें और लड़कियाँ अंदर ही हैं और मेरे बाहर आने का इंतज़ार कर रही हैं?
बाहर कुछ फुसफुसाहट शुरू हुई और मैं जानती थी कि मुझे कुछ करना था।
मैं खड़ी हुई और टायलेट पेपर से अपनी छूट साफ करने के बाद अपनी स्कर्ट को नीचे किया, अपनी चड्डी मैंने अपने पर्स में रखी और मैं बाहर आने को तैयार हो गई।
मेरे मन ने मुझसे कहा कि घबराने की कोई बात नहीं है शब्बो ! सब जो बाहर खड़ी हैं, उन सबके पास चूत है, उनमें बहुत सारी या सब वो ज़रूर करती होंगी जो मैंने अभी अभी किया है।
मैंने दरवाजा खोला, एक लंबी साँस ली और बाहर कदम रखा।
बाहर सब की सब जैसे सकते में खड़ी थी, सब की सब मेरी तरफ देख रही थी, मुझे निहार रही थी। किसी ने भी अपने मुँह से कोई आवाज़ नहीं निकाली, कुछ नहीं बोली।
मैंने और एक लंबी साँस ली और आगे बढ़ी।
मैं वॉश बेसिन तक आई और अपने काँपते हुए हाथ धोने लगी। मेरा चेहरा शर्म से लाल हो रहा था और साँसें तेज होने की वजह से मेरी चूचियाँ ऊपर नीचे हो रही थी।
सब की सब मुझे देखे जा रही थी और अपने मन में कहीं ना कहीं मैं अपने आप को उन सबसे बड़ी, सबसे लंबी, सबसे महान समझ रही थी।
एक औरत जो करीब 50 साल की थी और मेरी बगल में खड़ी थी। मैं जब अपने हाथ धोने के बाद उनको सुखाने की लिए टिश्यू पेपर लेने को अपना हाथ बढ़ाया तो वो औरत मुझे जैसे सूंघने लगी।
वो मेरे बदन की खुशबू लेने लगी।
लगा कि कोई कुछ कहना चाहती है मगर बोल नहीं पा रही है।
मैं अब तक अपने आप पर काबू पा चुकी थी।
अचानक वो औरत बोली- मुझे लगता है जो तुमने किया है, उसकी तुम को बहुत ज़रूरत थी, तुमने कुछ ग़लत नहीं किया।
वो मुस्कराते हुए कहती जा रही थी- इसमें घबराने या शरमाने की क्या बात है डियर! हम सबने ये किया है जो तुम ने किया है। यह हमारी ज़रूरत है और इसमे मज़ा भी तो बहुत आता है। मुझे पूरा यकीन है कि तुमको भी बहुत मज़ा आया होगा।मुझे तो सोच कर ही मज़ा आ रहा है।
और उसने सब की तरफ देखा, सब की सब मुस्करा रही थी। फिर सब की सब एक साथ हंस पड़ी, सारा तनाव ख़त्म हो गया।
एक सेक्सी सी लड़की ने ताली बजाई तो उसके पीछे पीछे सबने तालियाँ बजा कर मेरा स्वागत किया।
जैसे मैंने वो काम किया है, और खास करके वहाँ किया है जहाँ वो सोच भी नहीं सकती, मैं तो शर्म से और लाल हो गई।
मैंने उस औरत के गाल पर एक प्यारी सी पप्पी धन्यवाद के रूप में दी।
उसने भी जवाब में मेरे गाल पर धन्यवाद दिया, फिर वो बोली- जवानी में मैं भी तुम्हारी तरह थी।
उसने मेरे पर्स से झांकती हुई चड्डी की तरफ इशारा किया और बोली- क्या तुम अपनी यह प्यार की निशानी मुझे दे सकती हो? मैं अपने किटी क्लब की सहेलियों को दिखा कर बताना चाहती हूँ कि ऐसा सही में हुआ है।
वो मेरे पर्स से बाहर झाँकती हुई, गीला दाग लगी हुई, मेरी चूत का रस लगी हुई चड्डी को लगातार देखे जा रही थी।
मैंने अपना पर्स खोला और अपनी चड्डी उस औरत को देकर दरवाजे की तरफ बढ़ी।
मुझे बराबर याद नहीं है, पर मैं शायद वॉश रूम से निकल कर भागती हुई पार्किंग में अपनी कार तक आई थी। बाहर आने के बाद मैं एकदम शांत थी।
अपनी कार में बैठ कर मैंने फिर एक लंबी साँस ली और अपने घर की तरफ रवाना हुई। मैं अपने आपको बहुत संतुष्ट महसूस कर रही थी।

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