कैसे कन्ट्रोल करूँ-2

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लेखिका : नेहा वर्मा
अब तो जीजू मुझे किसी सेक्सी फ़िल्मी हीरो जैसे लगने लगे थे, वो तो मेरे लिये कामदेव की तरह हो चुके थे। दिन को भी मैंने अन्जाने में दो बार हाथ से चूत को घिस घिस कर, जीजू के नाम से अपना पानी निकाल दिया था।
मेरी नजरें बदल गई थी, जीजू ने भी मेरी हालत जान ली थी, वो इस मामले में बहुत तेज थे, उनकी मस्त निगाहें मुझे बार बार चुदने का निमंत्रण देने लगी थी, उनकी नजरें भी प्यार बरसाने लग गई थी।
मेरी नजरों में भी वो चुदाई का आमंत्रण वो पढ़ चुके थे।

आज मम्मी दीदी को लेकर चाचा जी से मिलवाने ले जा रही थी। शाम तक वो लौट आने वाले थे। जीजू का घर में ही रहने का कार्यक्रमथा, शायद वो मुझे चोदना चाहते थे, जीजू की मीठी नजरों को मैं समझ गई थी। मैं चुदने के इस ख्याल से आनन्दित हो उठी थी।
घर वालों के जाते ही मेरा दिल धड़कने लगा था। आज कुछ ना कुछ अनहोनी होने जैसा लगने लगा था। मुझे एकान्त चाहिये था, अपने आपको सम्भालने के लिये। मैं धीरे धीरे कमरे की ओर जाते हुये छुपी आंखों से जीजू को देखती हुई अन्दर आ गई। दिल जोर जोर से धड़कने लगा था। मैंने जल्दी से अपने कपड़े बदले, ब्रा और पेन्टी भी उतार दी और मात्र शमीज पहन कर बिस्तर पर लेट गई, शायद इस ख्याल से कि जीजू मुझे चोद डाले। मेरी आँखें जैसे सपने देखने के लिये तड़पने लगी थी। जीजू के लण्ड को पकड़ना, उसे चूसना… हाय… आज मुझे ये क्या हो रहा है। कैसा होगा जीजू का मस्त लण्ड, पास से देखू तो मजा आ जाये। इन्हीं ख्यालों में मेरी पलकें नींद से बोझिल होने लगी।
तभी जीजू ने धीरे से मेरे कमरे का दरवाजा खोल दिया। मैं जैसे होश में आ गई। जीजू को कमरे में पाकर मेरी छातियाँ धड़क उठी।
‘हाय जीजू, आप …?’ मैंने जल्दी से चादर को अपने कंधे तक खींचने की कोशिश की। पर जीजू ने मेरी भरी जवानी की एक झलक तो देख ही ली थी। मैंने जानकर ही तो वो छोटी सी शमीज पहनी हुई थी।
‘लेटी रहो…कम कपड़ों में तो नेहा तुम कितनी अच्छी लग रही हो !’ जीजू की आँखों में शरारत ही शरारत भरी थी।
‘आओ ना जीजू, यहीं आ जाओ !’ मैंने मुस्करा कर जीजू को पास बुला लिया। मेरी चूत उन्हें देख कर की पानी छोड़ने लग गई थी।
‘एक बात तो बताओ, उस दिन तुम दीदी के बारे में क्या कह रही थी?’ जीजू ने मुझे छेड़ा।
मैंने भी मौका देखा और जीजू को बातों में उलझाया।
‘वो दीदी रात को सी सी कर रही थी और फिर वो चीख भी रही थी, बस मैं तो इसी बात की शिकायत कर रही थी।’ मैंने जीजू को शरमा कर इशारा सा किया।
मेरा दिल अब जोर जोर से धड़कने लग गया था। जीजू की आँखें गुलाबी सी हो गई थी। उन्होंने शराबी सी आवाज में कहा- तुम्हारी दीदी को बहुत आनन्द आ रहा था ना इसीलिये वो सी सी रही थी…’
उसने मुझे सेक्स का सा इशारा किया।
‘आप झूठ बोलते है, मारने से आनन्द आता है क्या…?’ मैंने शरमा कर कहा।
‘नेहा जी आप भी एक बार मरवा कर देख लो…!’ जीजू ने एक कसा हुआ बाण चलाया।
‘क्या…क्या मरवाऊँ…?’ मैं हंसते हुये बोली, पर उनकी बातों से मैं तो मन ही मन में खिल सी गई, मेरी सांसें तेज होने लगी।
जीजू को सब समझ में आ गया था। मुझे लगा कि अब तो मैं गई काम से। जीजू तो अब मुझे जरूर ही चोद डालेंगे। मैं भी अपने आपको तैयार कर रही थी।
‘नेहा जी, वही जो आपके पास है, देखो आप बेकार में ही परेशान हो रही हो, मैं तो आपका जीजा जी हूँ, घर की बात घर में ही रहेगी !’ जीजू मेरे और करीब आ गये।
‘जी हाँ…घर की बात…घर में …’ मैं मुस्कराई और मेरी नजरें झुक ही गई,
नेहा, अपने नींबू तो दिखा दो।’
मैं समझ गई और शर्मा गई।
‘मेरे तो है ही नहीं…क्या देखोगे?’ मैंने हिम्मत करके कह ही दिया। जीजू ने मेरे निम्बुओं को अपने हाथ से टटोला। मुझे एक तेज गुदगुदी हुई।
‘अरे…क्या करते हो…मत करो ऐसे।’ मैं उनका हाथ झटक झटक कर हटाती रही।
पर वो नहीं माने…वो उसे सहलाते रहे। मेरी तो चूत पहले पानी से तर हो चुकी थी। वो पानी छोड़ने लगी थी। शायद मुझे अभी तो जवानी का मजा दे रहे है। मुझे भी नशा जैसा रंग चढ़ने लगा था…
मैं बिस्तर पर ही शरम से दूसरी ओर करवट बदल कर अपने पैर सीने की तरफ़ सिमटा लिये। पर मैं ये भूल गई थी कि मैंने पैंटी तो पहनी ही नहीं थी। मेरी छोटी शमीज चूतड़ों पर से ऊपर सरक गई थी और मेरे कोमल सुडौल चूतड़ नग्न हो गए थे। जिसमें से मेरी गाण्ड का गुलाबी छेद उन्हें साफ़ नजर आने लगा था।
तभी मेरी गाण्ड के कोमल छेद में गीला सा अहसास हुआ। उनकी जीभ ने मेरे छेद को चाट लिया था। मेरी छातियाँ धड़क उठी। मैं सिसक उठी। मेरे गालों पर उन्होने हाथ फ़ेर दिया। मैं शरम से लाल हो उठी। वो और नजदीक आते गये और मैं लाज से सिमटती सी चली गई।

वो मेरी गाण्ड के छेद को जोर जोर से चाटने लगे थे। जीजू की गरम सांसें मेरी गाण्ड से टकरा रही थी। मैं मस्ती से झूम उठी। अब उन्होंने अपने हाथों से मेरी चूचियाँ थाम ली और हौले से दबा दी…
उफ़्फ़ आह्ह्ह ! और फिर मुझे अचानक लगा कि उनके होंठ मेरे होंठों से टकरा गये।
मैंने अपनी आँखें खोली तो उनका चेहरा मेरे होंठों के बहुत ही पास था। मैं तो मदहोश हो उठी और मेरे नाजुक पत्तियों जैसे होंठ खुल गये। जीजू के होंठों ने मेरे निचले होंठ को धीरे से दबा लिया।
‘जीजू…हाय रे…बस करो …आह्ह्ह !’ मेरे मुख से निकल पड़ा।
मुझे अपनी छाती पर दबाव महसूस हुआ। मैं जीजू के नीचे दब चुकी थी। जीजू मेरे ऊपर चढ़ चुके थे। मैं हिल डुल कर कसमसाने की कोशिश करने लगी। इससे वो अपने लण्ड को मेरी चूत पर सेट करने में सफ़ल हो गये थे। मेरे मन में आनन्द की तरंगें उठने लगी थी। आनन्द इतना अधिक आने लगा था कि मैंने फिर अपने आपको ढीला छोड़ दिया। जीजू धीरे से मेरे ऊपर सेट हो गये थे। मेरे तपते शरीर पर उनका भारी शरीर सवार हो चुका था। मेरे गुप्त अंगों पर दबाव बढ़ता जा रहा था।
फिर मैं भी अपनी चूत को उनके भारी लण्ड पर दबाने लगी। मेरी चूत लण्ड लेने के लिये बार बार ऊपर उठ कर उनके लण्ड को दबा रही थी। मेरे मुख से आनन्द भरी सिसकारी निकलने लगी- ओह्ह मेरे जीजू…मैं तो मर गई…
उनका लण्ड मेरी नाजुक सी चूत को धीरे धीरे घिसने लगा। मेरा दिल पिघलता जा रहा था। मैं तो चुदने के तड़पने लगी।
‘नेहा, लण्ड लोगी?’ जीजू ने सीधे ही पूछ लिया।
‘क्क्क्या…जीजू…?’ मेरा मुख खुला ही रह गया। मेरी नशीली आँखें ऊपर उठ गई। हाय अब तो चुद गई मैं तो…
‘चूत दोगी मुझे…?’ उन्होंने फिर से मुझे बड़े मोहक भरे अन्दाज में कहा।
‘उसके लिये तो दीदी है ना…’ मैंने धीरे से मुस्करा कहा। मैं तो शरम से पानी पानी हो रही थी।
‘दीदी की अब चूत कहाँ रही है वो तो भोसड़ा हो गई है।’
‘तो क्या हुआ, गाण्ड तो है ना?’ मैंने दबी जबान से कहा।
‘वो भी अब तो खुल कर भोसड़े के समान हो चुकी है।’
‘तो फिर मेरी मारोगे…? चलो हटो, गुण्डे कहीं के !’
जीजू मेरे ऊपर से धीरे से हट गये और बिस्तर पर ही बैठ गये। जीजू का कड़क लण्ड पजामें में से तम्बू की तरह खड़ा हुआ था। मुझे बहुत खराब लगा, सारी मस्ती चूर चूर हो गई थी। उनके खड़े हुये लण्ड से चुदने को पूरी तैयार थी। उनके इस तरह से हट जाने से मैं परेशान सी हो गई। पर मुझे क्या पता था कि आगे के कार्यक्रम क्या है।
मैंने अपनी शमीज ठीक की पर वो छोटी बहुत थी।
‘जीजू, मुझे वो अपना…दिखाओ ना !’ मैंने तिरछी निगाह से जीजू के लण्ड की ओर देखा।
‘क्या लण्ड देखोगी?’ जीजू ने मुझे फिर भड़काया, दिल तेजी से धाड़ धाड़ करने लगा
‘हाय कैसे बोलते हो…हाँ वही …’ मेरा तो जिस्म ही कांपने लगा था।
‘पकड़ोगी मेरा लण्ड…?’ उन्होंने फिर मुझे शर्म से लाल कर दिया। मैंने शरमाते हुये हाँ कह दिया।
‘चूसोगी…?’ वो फिर मुझे बोल बोल कर दिल तक को हिलाते रहे।
‘धत्त…इसे कौन चूसता है?’ मेरी शर्म से भीगी आवाज निकली।
जीजू ने अपना लण्ड बाहर निकाल दिया। आह्ह्ह ! सच में उसका लण्ड बहुत ही सुन्दर, गोरा और बलिष्ठ लग रहा था। उसकी नसें उभरी हुई लाल सुर्ख सुपाड़ा बहुत ही अद्भुत और चमकदार था। मैंने शरमाते हुये किसी मर्द का लाल सुर्ख लण्ड पहली बार बार थामा।
‘लण्ड थामा है तो साथ निभाना !’
‘धत्त, ऐसे क्या कहते हो?’
मैंने जीजू का लण्ड दबाना और मसलना शुरू कर दिया। जीजू आहें भरने लगे। बहुत कड़क लण्ड था।
अचानक जीजू ने मेरे बाल पकड़े और मेरे सर को अपने लण्ड पर ले आये।
‘नेहा चूस ले रे मेरे लौड़े को…स्स्स्सी सीईईइ चूस ले यार…’ जीजू ने अपना मोटा लण्ड मेरे गाल पर रगड़ दिया। फिर उसका गुदगुदा चमकता हुआ लाल सुपाड़ा मेरे मुख में समा गया। फिर वो अपने कूल्हे हिला हिला कर मेरे मुख को जैसे चोदने लगा।
फिर मैंने उसे पूछा- इसमें बहुत मजा आता है क्या…?
मैंने धीरे से पूछ लिया।
‘मेरी नेहा, बस पूछो मत…चल अब लेट जा…अपनी टांग उठा ले…चुदा ले अब !’ उफ़्फ़्फ़ जीजू कैसे बोलते है हाय रे।
मैंने अपनी दोनों टांगे चौड़ी करके ऊपर उठा ली। जीजू मेरी टांगों के बीच में फ़िट हो गये और अपने हाथों से मेरी भीगी हुई नंगी चूत में लण्ड को जमाने लगे। मुझे उनका भारी सा लण्ड का नरम सा अहसास लगा। फिर मेरी छोटी सी तंग चूत में उसका लण्ड घुसने सा लगा। मुझे लगा ओह्ह मेरी चूत तो अपना मुँह खोलती ही जा रही है। जाने कितनी चौड़ी हो जायेगी ये…मुझे तेज मीठा सा आनन्द आया।
तभी जीजू ने मेरे होंठों को अपने होंठों पर रख कर उसे चूसने लगे और साथ ही कमर उठा कर अपने चूतड़ों से जोर लगा कर लण्ड को जोर से घुसड़ने लगे। मैंने भी तड़प कर जीजू को जोर से बाहों में दबा लिया और लण्ड को भीतर घुसेड़ने का सम्पूर्ण यत्न करने लगी। कितना कसता सा अन्दर जा रहा था। तेज आनन्द भरी खुजली, बहुत मजा आ रहा था।
‘मेरे जीजू…जरा कस कर…बहुत मजा आ रहा है।’ मेरे मुख से आखिर निकल ही गया।
‘बहुत कसी है नेहा जानम !’ जीजू ने मेरी तंग चूत पर जोर लगाते हुये कहा।
‘उह्ह्ह्ह…बस चोद दो अब…हाय रे, मर जाऊँगी राम…और जोर से दम लगाओ ना !’
जीजू ने धीरे धीरे जोर लगा कर लण्ड को बच्चेदानी के मुख तक पहुँचा दिया। उसका लण्ड का योनि में इतना टाईट फ़िट होने से मुझे बहुत आनन्द आने लगा था। हम दोनो के शरीर एक हो चुके थे, लण्ड से जुड़ चुके थे। अब जीजू धीरे से धीरे मेरी चूत पर अपना लण्ड घिस रहे थे। मुझे बहुत तेज उत्तेजना लग रही थी।
अब जीजू थोड़े से ऊपर उठ गये थे और अपने शरीर को थोड़ा सा ऊपर उठा लिया था। अब वो लण्ड अन्दर-बाहर करके मुझे चोद रहे थे। लण्ड और चूत दोनो ही चूत के पानी से सरोबार हो चुके थे और थप थप की आवाजें आने लगी थी। उनके इन्हीं प्यारे धक्कों से मुझे मस्ती का ज्वार चढ़ने लगा था और मैं अपनी चूत उछल उछल कर चुदाने लगी।
मस्ती भरी चुदाई, मस्त नशा…मस्त खुमार…इतना चढ़ा कि नहीं चाहते हुये भी मेरी चूत ने रस की धारा छोड़ दी। मेरी चूत जोर जोर से अन्दर बाहर होकर मचक मचक करने लगी और अपना काम रस धीरे धीरे छोड़ने लगी।
जीजू कुछ कुछ हांफ़ते हुये दो मिनट के लिये रुक गये। मैंने भी झड़ने के बाद करवट ले ली और थोड़ी सी उल्टी हो कर लेट कर आनन्द के क्षण को महसूस करते हुये मुस्कराने लगी।
उससे जीजू पर उल्टा ही असर हुआ। उन्होंने मेरे मस्त चूतड़ों को थपथापाया और मेरी गाण्ड के पटों को चीर दिया। भीतर से मेरी कई बार की चुदी हुई गाण्ड मुस्कराने लगी। जीजू ने उसे और खींच कर खोला और अपना लण्ड गाण्ड की छेद पर रख दिया और अपना सम्पूर्ण भार डालते हुये मुझ पर झुक गये।
उसका लण्ड मेरी गाण्ड के भीतर सहजता से उतर गया। मैंने भी पेट के बल लेट कर अपनी पोजीशन ठीक कर ली और गाण्ड की ढीली करके लण्ड को उसमें घुसाने में सहायता की।
जीजू के दोनों हाथ मेरी पीठ से सरकते हुये मेरे सीने पर आ कर जम गये। मेरी गेंद जैसी चूचियों को मसलने लगे।
पहले तो मुझे तेज मीठी सी जलन सी हुई, फिर तेज मीठी सी कसक तन में भरती चली गई। मजा बहुत आने लगा था। मेरी चूचियों पर जीजू का हाथ भारी पड़ रहा था। जीजू ने अपना पूरा जोर लगा दिया और उनका कठोर लण्ड मेरी गाण्ड में घुसता चला गया। गाण्ड मराई में इतना मजा आता है मैंने तो कभी सोच ही ना था। ये तो जीजू के मोटे लण्ड का कमाल था।
‘साली की माँ चोद दूँगा, साली चिकनी…गाण्ड मार कर फ़लूदा बना दूँगा।’
‘ओह्ह, मीठी मीठी गालियाँ…अच्छी लग रही हैं जीजू…मार दे मेरी गाण्ड ! हाय रे जीजू ! जोर से, मार दे यार !’
‘ले छिनाल…चुद ले अब तू भी…याद करेगी कि तुझे तेरे जीजू ने चोदा था।’
‘दीदी की तरह चोदो ना।’
‘ओह तो तुम सब देखती हो…’
यह कह कर वो जोर जोर से मेरी गाण्ड मारने लगा। इतनी देर में मेरी चूत फिर से उत्तेजित हो चुकी थी, मुझे उसी वजह से बहुत मजा आने लगा था। मैं अपनी टांगे बिस्तर पर फ़ैलाये उल्टी लेटी गाण्ड चुदवा रही थी। हाय राम ! जीजू कितने अच्छे हैं, मुझे कितना सुख दे रहे हैं.. यह सोचते हुये मैं चुद रही थी कि जीजू ने जोर हुंकार भरी और अपना लण्ड मेरी गाण्ड से बाहर निकाल लिया। मैंने सीधे होकर उनका लण्ड अपने हाथ में ले लिया और जोर जोर से मुठ्ठ मारने लगी। तभी उसके लण्ड के सुपाड़े के बीच में से जोर की धार निकल पड़ी। मैं उस धार को ध्यान से देखती रही…कैसा रुक रुक कर वो दूध छोड़ रहा था। मेरी छातियों पर, पेट पर और कुछ बूंदें मेरे मुख पर भी बरस रही थी।
‘अरे रे…छिः छिः ये क्या कर दिया…मुझे तो गीली कर दिया।’
‘नेहा रानी…जरा चख कर तो देखो !’
‘क्या…?’
ये देखो…! ‘ उन्होंने अपनी एक अंगुली से अपना वीर्य उठा कर चूस लिया।
मैंने उसे आश्चर्य से देखा। फिर उसी अंगली से थोड़ा सा वीर्य और उठाया और मेरे मुँह में अंगुली डाल दी। उसे बताने के लिये तो मैंने उसे ऐसे जताया कि जैसे वो बहुत स्वादिष्ट हो।
फिर मैं उठी और बाथरूम में चली आई। मैंने झांक कर देखा वो बिस्तर पर लेटा हुआ सुस्ता रहा था। मैंने अन्दर जाकर मेरी छाती पर पड़ा हुआ वीर्य फिर से चखा, फिर और चखा…फिर पूरा ही चाट लिया…उह, कोई खास तो नहीं…बस यूँ ही चिकना सा, फ़ीका फ़ीका सा…पर शायद मर्द इसी बात से खुश होते होंगे।
मैंने शावर खोला और स्नान करने लगी। तभी जीजू ने पीछे से आकर मुझ गीली को ही दबोच लिया और मुझे चूमने लगे। मैं जीजू की बाहों में तड़प उठी। उनके लण्ड ने मेरी गीली चूत में ठोकर लगानी शुरू कर दी। मैंने भी अपनी टांगें चौड़ा दी, रास्ता साफ़ देख कर जीजू ने मेरी चूत में अपना लण्ड घुसा दिया।
अह्ह्ह…मजा आ गया…हाय ! मैंने अपनी एक टांग साईड में ऊंची कर दी। लण्ड तो जैसे जन्म-जन्म का प्यासा था… अन्दर-बाहर होता हुआ उनका लण्ड एक बार और चूत में उतर गया।
जीजू मुझे अब बहुत जोर से आनन्दित करके चोद रहे थे। जीजू ने मुझ गीली जवानी को जी भर कर चूसा… मुझे मस्ती से चोदा…और मैंने भी उनका मस्त लण्ड खूब उछल उछल कर लिया… अपनी प्यासी चूत को लण्ड का आनन्द दिया।
उनका मस्त लण्ड जी भर कर खूब चूसा, उसका खूब रस निकाला।
शाम तक मैंने जीजू के लण्ड के साथ खूब मस्ती की। उनके खूबसूरत सुपाड़े को खूब चूसा, अपनी मस्त जवान चूत भी चुसवाई। उन्होंने मेरे चूत के मटर के समान मस्त दाने को अपने होंठों से खूब चूस चूस कर मुझे मस्त किया।
हाय राम…उस दिन तो मैंने जीजू से खूब चुदवा चुदवा कर आनन्द लिया, जीजू मेरी मस्त गाण्ड को भी कितनी ही बार बजाई।
उनके जाने के बाद भी यह कार्यक्रम बाद में भी बहुत महीनों तक चलता रहा। पर समय के साथ साथ यह सब कम होता चला गया।
पर क्या करूँ जवानी का नशा था वो भी पहला नशा…कण्ट्रोल नहीं होता है ना। किसी से अपना शरीर दबवाने की, नुचवाने की इच्छा तो हो ही जाती है ना। दिल मचलने लग जाता है, जिसे सोचने से चड्डी तक गीली हो जाती है।
चलो अब देखते है मेरे नसीब आगे कौन लिखा है…
नेहा वर्मा

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